Thursday, February 26, 2026
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दलित वर्ग के क्रांतिकारी वीर मनीराम अहिरवार को क्यों नहीं मिला राष्ट्रीय सम्मान?


लोगों ने राष्ट्रीय सम्मान दिलाए जाने हेतु सरकार से की अपील

नरसिंहपुर जिले की चीचली शहीद नगरी के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन की अनकही गाथा

✍🏻 मूलचन्द मेंधोनिया, शहीद सुपौत्र, ग्राम चीचली तहसील गाडरवारा जिला नरसिंहपुर (म.प्र.) मोबा. – 8878054839


अंग्रेजों से सीधी टक्कर लेने वाले योद्धा

भारत स्वतंत्रता आंदोलन में हर वर्ग ने अपना खून-पसीना बहाया। जहां महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, खुदीराम जैसे नाम राष्ट्रीय पटल पर चमकते हैं, वहीं दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के वीर क्रांतिकारियों का योगदान अक्सर उपेक्षित रहा। इन्हीं अनदेखे शहीदों में एक नाम है वीर मनीराम अहिरवार का, जिन्होंने 23 अगस्त 1942 को अंग्रेजों से चीचली के गोंड राजमहल की रक्षा करते हुए इतिहास रचा।


1942 में चीचली का रणक्षेत्र

सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब गोंड राजा शिक्षा हेतु बाहर थे, अंग्रेजों ने राजमहल पर कब्जे की योजना बनाई। उसी समय राजमहल की सुरक्षा कर रहे मनीराम अहिरवार ने अंग्रेजों को ललकारा और कहा—
“हमारे महल की ओर कदम मत बढ़ाना, वरना मुझसे भिड़ना होगा।”

कमर में गुफना, हाथ में गुलेल और अदम्य साहस से लैस मनीराम ने अंग्रेज सेना को चुनौती दी। इसी दौरान मंशाराम जसाटी अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए, और गौरा देवी कतिया भी वीरगति को प्राप्त हुईं।


अंग्रेज भी कांप उठे उनके साहस से

मनीराम ने पत्थरों और गुफना से अंग्रेजी सैनिकों को घायल कर खदेड़ दिया। लेकिन बाद में धोखे से गिरफ्तार कर उन्हें जबलपुर की गुप्त जेल में ले जाया गया। वहां उन्हें भारी यातनाएं दी गईं और लालच भी दिया गया कि दलित-आदिवासी युवाओं को अंग्रेजी सेना में भर्ती कराओ। परंतु मनीराम ने एक भी शर्त नहीं मानी। अंततः अंग्रेजों ने उन्हें जेल में ही गुप्त रूप से दफना दिया।


आज तक सम्मान से वंचित शहीद

वीर मनीराम अहिरवार जैसे क्रांतिकारी जिन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए न्यौछावर किया, उन्हें आज तक राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। शहीद परिवार और स्थानीय समाज लगातार मांग कर रहा है कि—

  • वीर मनीराम अहिरवार को राष्ट्रीय शहीद का दर्जा दिया जाए।
  • चीचली नगर और नरसिंहपुर जिले को उनके नाम से सम्मानित किया जाए

जातिवाद की वजह से उपेक्षा?

इतिहास गवाह है कि दलित, पिछड़े और आदिवासी वर्ग के अनेक वीर सपूतों का बलिदान आज भी इतिहास की किताबों में गुमनाम है। मनीराम अहिरवार भी उनमें से एक हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक समाज के इन वास्तविक नायकों को सम्मान से वंचित रखा जाएगा?

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