Thursday, February 26, 2026
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‘इटावा’ ने आग लगाई!

🌻 ‘इटावा’ ने आग लगाई! उत्तर प्रदेश का इटावा चर्चा में है। जन मानस में आग लगी है। रुकने का नाम नहीं ले रही है। ओबीसी बड़ी संख्या में अभिव्यक्ति दे रहे हैं। यह पहली बार हो रहा है! यह ब्राह्मणों के गॉंव में घटित हुई। गॉंव का नाम दांदरपुर है। इटावा जिले में आता है। घटना परसों 21.06.2025 की है। कथावाचक के यादव (अहीर) होने का पता चलने पर ब्राह्मण चिढ़ गए। शुद्र हमें कथा बताएगा? चिंगारी भड़क उठी। शिव शिव। आग बुझे ही ना। सामूहिक पिटाई की गई। सिगरेट से दागा गया। चोटी काटी गई। मुंडन कर दिया गया। गालियों के परनाले बहे। मनमानी की गई। बेचारे कथावाचक, मुकुटमणि यादव, संत सिंह यादव और अंधा ढोल वादक असहाय थे। सारे गॉंव के सामने करते ही क्या? ‘शुद्र होकर ब्राह्मणों के गॉंव में कथा बाँचोगे? यह अधिकार किसने दिया? यह चोटी कैसे रख ली? पहले यह काटी जाएगी।’ मुकुटमणि की चोटी काटी गई। अच्छी हाथ भर लम्बी थी। और तू दूसरा? तू तो चमार ही दिखाई दे रहा है। तू इसका सहयोगी है? तेरी भी चोटी है? एक थैली के चट्टे बट्टे।’ नहीं, मैं चमार नहीं। यादव हूँ। आधार कार्ड दिखा। लाया नहीं। घर के लोगों का नंबर दे। यह लो। मैं शिक्षक था। जब शाला बंद हो गई तो कथावाचन करने लगा। मुकुटमणि का सहायक बना। झूठ बोलता है। चालाक लगता है। इसका मुंडन करो। बाल काटे गए। सबका चरण स्पर्श कराया गया। कथा करवानेवाली पंडिताइन के पैरों पर नाक रगड़वाई गई। सब किया गया। अंततः पंडिताइन का मूत्र छिड़ककर पवित्र किया गया। तब कहीं जाकर छोड़ा गया। अपराध क्या था? तीनों ही यादव निकले। फिर भी कथावाचन का कार्य करते हैं। चोटी रखते हैं। मतलब नक़ली पंडित हैं। इस पर कथावाचक बताते हैं, हमने जाति छुपाई ही नहीं। हमसे पूछा ही नहीं गया। हमने बताई नहीं। जब कथा करवाना निश्चित हुआ तब भी नहीं पूछा गया। सुबह का कथावाचन सुगमता से हुआ। शाम को हंगामा मचा। फिर प्रताड़ित किया गया। हारमोनियम तोड़ा गया। ढोलक भी फोड़ी गई। पुलिस में शिकायत दर्ज की गई। जिनका मुंडन हुआ उन्हीं चारों पर अपराध मढ़ा गया। इस बीच अब नया कोण निर्मित हुआ है। मुकुटमणि स्वयं को अग्निहोत्री लिखता है। पंडित बताता है। संबंधित स्त्री शिकायत करती है कि वह शरीर को छू रहा था। अब ये शिकायतें हो रही हैं। इस तरह से भांति प्रकार से यह प्रकरण चर्चा में है। यादवों का ‘करंट’ बहुत है। बिहार चुनाव के समक्ष यह हुआ है। सोशल मीडिया इस प्रकरण से भरा हुआ है। अखिलेश यादव के पीडीए ने यह प्रकरण उठाया है। नया मंथन शुरू हुआ है। ‘बटेंगे तो कटेंगे’ या ‘ धर्म पूछकर गोली मारी’ की चीरफाड़ हो रही है। यहॉं भी जाति पूछी जाती है। एक ही धर्म के लोग होने के बावजूद। ऊँच नीच का यही आधार है। यहॉं यही ज़िंदा है। हिन्दू राष्ट्र की समीक्षा हो रही है। “क़ायदे (धर्म के) में रहोगे तो फ़ायदे में रहोगे।” यह फ़ायदा यही है क्या? ऐसा छूटते ही पूछा जा रहा है। यह प्रश्न, ओबीसी का ऐसे चैतन्य होना, ऐसी चेतना, स्वस्थ संकेत है। ० रणजित मेश्राम 👤अनुवाद- हेमलता महिश्वर

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