Friday, April 17, 2026
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“गणेश, नमक और पानी”

मूकनायक/देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”

😡😡 स्पर्श हिन्दू समाज के द्वारा डॉ आंबेडकर जी तिरस्कार और अपमान करके अंततः समाज ने उन्हें समझा दिया कि अस्पृश्य व्यक्ति कितना ही विद्वान क्यों न हो जाय, रहता है अस्पृश्य ही है! उस समय अपमान की जो घूँट डा. आंबेडकर पी गए वही आगे चलकर ज्वाला के रूप में फुटी हो तो अस्वाभाविक नहीं थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि उस ज्वाला में स्वयं डा. आंबेडकर नहीं जल बुझे। वस्तुतः वह अग्नि तेज के रूप में प्रकट हुई!

😡 अपमान की इस ज्वाला का प्रथम विस्फोट है महाड के चावदार तालाब में पानी पीने का सामूहिक साहस। कहने की आवश्यकता नहीं कि बाबासाहेब के इस आंदोलन का बहुत बड़ा प्रतीकात्मक महत्त्व है। एक समय लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव के द्वारा राष्ट्रीय मुक्ति का विराट आंदोलन शुरू किया था। फिर महात्मा गांधी ने दांडी मार्च करके नमक सत्यागृह के द्वारा अंग्रेजी राज के विरुद्ध भारतीय जनता को जागरित करने का प्रयास किया। बाबा साहेब आंबेडकर के चवदार तालाब आन्दोलन को भी इसी कड़ी में रख कर देखना चाहिए जिसके मूल में अस्पृश्य जनों द्वारा सार्वजनिक जलाशय से पानी पीने के बुनियादी अधिकार की माँग थी। यदि गणेश, नमक और पानी इन तीनों को प्रतीक के रूप में लें तो तिलक, गांधी और आंबेडकर के आंदोलनों की प्रकृति का अंतर स्पष्ट हो जाता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि बाबासाहेब आंबेडकर का आंदोलन सबसे बुनियादी और नितान्त मानवीय था।

💎💎 बाबा साहब डॉ आंबेडकर का शोषितों के लिए उनका यही संदेश था कि आत्मोद्धार के लिए लड़ते रहो। स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और आत्मोद्धार ही उनकी सूत्रत्रयी थी। बाबा साहब डॉ आंबेडकर की दृष्टि में “सामाजिक गुलागी राजनीतिक गुलामी से ज्यादा अमानुषिक है।” अपनी इसी समझ के कारण बाबासाहेब ने गांधी से भी टक्कर ली। प्रश्न सिद्धान्त का था और प्रज्ञावादी डा. आंबेडकर शोषित मुक्ति के सिद्धान्त के मामले में किसी प्रकार का समझौतावादी रुख अपनाने के लिए तैयार न थे। इसीलिए उस समय से बाबासाहेब डॉ आंबेडकर को शोषितों का मसीहा कहा जाता है।
लेखक :🅰️🅿️ singh
जय भीम जय भारत जय संविधान

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