Friday, April 17, 2026
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क्या आप दीप के नाम पर दीपावली मनाएंगे????:: भिक्खू चन्दिमा

मूकनायक

देश

(राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा )

प्रिय! उपासक/उपासिकाओं…
मैं इस संदर्भ में दो विचारों को सुनता और पढ़ता रहा हूँ.
1- कुछ लोगों का मानना है कि महाराजा अशोक ने इसी दिन 84 हजार स्तूपों का अनावरण किया था,
जिसकी सजावट दीपों एवं पुष्प मालाओं से किया गया था।
इसलिए इसे दीपदानोत्सव अथवा दीपमालिका उत्सव कहते हैं.

प्रश्न उत्पन्न होता है कि…
क्या अशोक धम्म दीक्षा ग्रहण करने के उपरांत अपने जीवन काल में प्रतिवर्ष स्थापना दिवस पर दीपदानोत्सव करते रहे?

उत्तर है…
इसका कोई भी प्रमाण किसी भी बौद्ध ग्रंथों में नहीं मिलता .

अशोक ने जिस दिन पाटलीपुत्र में स्तूपों का अनावरण किया था उसी दिन धम्म दिक्षा भी ग्रहण की थी.
उस महान दिवस को अशोक धम्म विजय दशमी के नाम से जाना जाता है,
अर्थात वह दिन कार्तिक मास की आमावस्या नहीं दसमी का दिन था,
फिर आमावस्या के दिन दीपदानोत्सव क्यों?

2- कुछ लोगों का मत है कि..
इसी दिन तथागत गौतम बुद्ध संबोधि प्राप्ति के 7वे वर्ष बाद कार्तिक अमावस्या को कपिलवस्तु पधारे थे,

त्रिपिटक ग्रन्थों का कहना है कि राजकुमार सिद्धार्थ को वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्धत्व की प्राप्ति हुई.
उन्होंने सारनाथ में अषाढी पूर्णिमा को प्रथम उपदेश दिया तथा प्रथम वर्षावास भी सारनाथ में ही व्यतीत किया.
कार्तिक पूर्णिमा तक तथागत सारनाथ में ही रूके रहे उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा को ही “चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय” का उपदेश दिया तदोपरान्त वह सद्धम्म के प्रचार-प्रसार हेतु कपिलवस्तु न जाकर मगध की ओर चले गए.
इस प्रकार यह कहना बिलकुल ही निराधार है कि तथागत बुद्ध कार्तिक अमावस्या को कपिलवस्तु गए थे.

मैंने जितना भी प्राचीन बौद्ध साहित्य या त्रिपिटक साहित्य को पढा है, दीपदानोत्सव के बारे कोई जानकारी नहीं मिलती.

मै यह भी स्वीकार करता हूँ कि महाराजा अशोक ने अनावरण के समय दीपदानोत्सव कराया होगा लेकिन प्रति वर्ष ऐसा उत्सव देखने को नहीं मिला जबकि वह कई वर्ष जीवित रहे.

फिर आजकल के लोग दीपदानोत्सव मनाने के लिए इतना व्याकुल क्यों है?
क्या इससे अवसरवादी लोगों को बल नहीं मिलेगा?
आज भी आप लोगों जब कोई नया विहार या आवास बनाते हैं तो उसके उद्घाटन या अनावरण के अवसर पर साज-सज्जा करते हैं,
लेकिन प्रति वर्ष इस प्रकार का उत्सव देखने को नहीं मिलता.

यदि दीपदानोत्सव का संबंध तथागत बुद्ध या अशोक के जीवन से संबंधित होता तो तथागत बुद्ध के अनुयायी जिन-जिन देशों में गये वहा “बुद्ध पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा,आषाढ़ पूर्णिमा” आदि की भातिं यह पर्व भी धुम-धाम से मनाया जाता.

लेकिन किसी भी बौद्ध देश में दीपदानोत्सव नहीं मनाया जाता है.
इसलिए मै इस निष्कर्ष पर पहुचा हुँ कि दीपावली का संबंध बुद्ध-धम्म से नहीं है.

इसलिए मेरा मत है कि सांस्कृतिक घालमेल करने से अच्छा है कि दीपदानोत्सव का आयोजन इन प्रमुख दिवस पर किया जा सकता हैं.

वैशाख पूर्णिमा,
आषाढी पूर्णिमा,
कार्तिक पूर्णिमा,
अशोक धम्मविजय दसमी तथा
14 अप्रैल.

उपासक/उपासिकाओ को चाहिए कि वह प्रत्येक अमावस्या की भातिं इस अमावस्या को भी उपोसथ दिवस के रूप में ही मनाते हुए आठ शीलो का पालन करे.

सायं त्रिरत्न वंदना, परितपाठ, ध्यान- साधना तथा धम्म चर्चा करे.

घनसारप्पदित्तेन दीपेन तमधंसिना।
तिलोकदीपं सम्बुद्धं पूजयामि तमोनुदं।

इन गाथाओं के साथ भगवान बुद्ध के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें।

पूज्य भिक्खु चन्दिमा थेरो जी (सारनाथ)

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