Thursday, February 26, 2026
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ब्रह्मबाद के अंबेडकर पार्क में मनाया गया शौर्य दिवस

राष्ट्रीय प्रभारी/ओम प्रकाश वर्मा(9001101338)

भरतपुर जिले के बयाना उपखंड के गांव ब्रह्मबाद में भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस ग्रामीणों द्वारा मनाया गया। ब्रह्मबाद के अंबेडकर पार्क में विश्वरतन महामानव संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर प्रतिमा के पास भीमा कोरेगांव युद्ध में शहीद हुए महार सैनिकों को 2 मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। और बाबा साहब के प्रतिमा पर सेवानिवृत्ति तहसीलदार शोभाराम द्वारा माल्यार्पण कर भीमा कोरेगांव युद्ध में विजय प्राप्त होने पर शौर्य दिवस मनाया गया एवं सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर मूकनायक अखबार के राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा ने सभा को संबोधित करते हुए बताया कि 1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेंगाँव युध्द में 500 महार सैनिकों ने 28000 पेशवा को हराया था।
बाबासाहेब डाँ. अम्बेडकर ने ठीक ही कहा था कि “अगर इस देश में दलित पिछड़ों को भी हथियार चलाने का अधिकार होता तो यह देश कभी गुलाम नहीं होता।”
हम जानते हैं कि मराठा राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज जो कि स्वयं शुद्र थे जिन्होंने मुगलों से अपना लोहा मनवाया। भीमा कोरेगाँव की लड़ाई लड़ी जिसकी तारीख 1जनवरी 1818 स्थान – भीमा नदी के तट पर बसा गाँव भीमा कोरेगाँव पुणे (महाराष्ट्र) और सामने थी दो सेनाऐ एक ओर अंग्रेजों की बम्बई नेटिक इंफैन्टरी जिसमें थे मात्र 500 महार सैनिक और दूसरी ओर थी पेशवाओं की 28000 सैनिकों की विशाल सेना, जिसमें 20 हजार घुड़सवार व 8 हजार पैदल सैनिक। जिसकी कमान थी पेशवा बीजाराव-| | के पास। बदले की आग में तपे रहे 500 महार योध्दाओं ने 12 घंटे बिना खाने, बिना पानी तथा बिना रूके ऐसे लड़े की सालो के क्रूर पेशवाई राज को 12 घंटो में हमेशा के लिए उखाड़ फेंका। महार शूरवीरों ने हजारों ब्राह्मण पेशवाओं को मार गिराया तो अनेकों डर के मारे मैदान से दूम दबाकर भाग गए। अंततः पेशवाई सेना महारों के आगे घुटने टेक दिये। महारों की इस विजय ने क्रूर पेशवाई शासन का हमेशा के लिए खात्मा कर अपना गौरवमय अकल्पनीय इतिहास लिख डाला।

कोरेगाँव के मैदान में जिन महार सैनिकों ने वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया उनकी याद में अंग्रेजों ने उनके सम्मान में सन् 1882 में भीमा कोरेगांव में भीमा नदी के किनारे काले पत्थरों का क्रांति स्तम्भ का निर्माण किया जिन पर वीर महारों के नाम लिखे गए। सन् 1818 में बना यह स्तम्भ आज भी महारों की वीरता की गौरवगाथा गा रहा है। महारों की वीरता के प्रतीक के रूप में अंग्रेजों ने विजय स्तम्भ बनाया कोरेगाँव की लड़ाई इतिहास के पन्नों से गायब ही हो चुकी थी लेकिन जब 1927 में बाबासाहेब डाँ अम्बेडकर यहां आए तो इस स्थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया। इस अवसर पर लॉर्ड बुद्धा सेवा संस्थान के उपाध्यक्ष थान सिंह वर्मा, सचिव पवन राज वर्मा ,एल एस ए मोहन सिंह बर्मा ,अंकित कुमार वर्मा, विवेक कुमार, अवधेश कुमार वर्मा, राहुल कुमार वर्मा ,हेतराम वर्मा ,प्रीतम सिंह पुजारी, निहाल सिंह, अशोक कुमार, भारती सिंह, योगी कुमार, धर्म सिंह ,लाखन सिंह, धरम वीर, लज्जाराम वर्मा, नवल सिंह, जगन सिंह ,आकाश कुमार वर्मा, मोहित कुमार वर्मा, रियांश राज वर्मा सहित बाबा साहब के सैकड़ो अनुयाऊ उपस्थित रहे ।

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