मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
🗣️ अल्पसंख्यकों ने आपस में सुलह कर ली। गांधीजी ने इसके खिलाफ कड़ा भाषण दिया। उन्होंने कहा, “अस्पृश्य समाज हिंदू समाज का ही एक अंग है। इसलिए वह अल्पसंख्यक नहीं है।” हमेशा की तरह विरोध करते हुए उन्होंने अछूतों की माँगों का पुरजोर विरोध किया। अब गांधीजी को करारा जवाब देना होगा। गोलमेज सम्मेलन में मैंने जो भूमिका निभाई, वह मेरे विवेक के अनुरूप थी। अछूत हिंदू भाई हैं, इसलिए उनमें सुलह करा देनी चाहिए। ऐसा गांधीजी का दावा था। इसी समय उन्होंने मुसलमानों के बीच एक गुप्त समझौता किया और मुसलमानों से कहा, “कांग्रेस आपकी चौदह माँगों को स्वीकार करती है, लेकिन आपको यह भूमिका निभानी चाहिए कि अल्पसंख्यक और अछूत स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की माँग न करें।” मेरे पास इसका सबूत है। अगर गांधीजी के किसी शिष्य को यह देखना है तो वह मेरे कार्यालय में आए। गांधीजी ने मुसलमानों का समर्थन पाने के लिए होटल में आगा खान से मुलाकात की। उन्होंने बाजार से कुरान की पुस्तक खरीदी और आगा खान को मनाने लगे। तब आगा खान ने गांधीजी से कहा, “अस्पृश्य समाज बहुत कमजोर है। उन्हें सभी सहायता और अधिकार मिलने चाहिए। मुसलमानों की तुलना में उन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है। मुझे ऐसा लगता है, मैं ऐसा व्यवहार करूँगा।” गांधी निराश होकर लौटे।
🗣️ सबके सहयोग और समर्थन से मुझे अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ने की ताकत मिलती है। मेरा आंदोलन और मेरा काम सिर्फ महारों तक ही सीमित नहीं है। राष्ट्रहित का दावा करने वाले अखबार देशद्रोही होने और दूसरों को गाली देने का काम करते हैं। अछूतों ने इन अखबारों से बिना डरे मुझे सबसे ज्यादा सहयोग दिया है, इसलिए मैं लंदन में कुछ-न-कुछ काम करता रहा हूँ। आप संगठन को मजबूत करें, साहस और अनुशासन के बल पर हम आगे बढ़ेंगे।
🗣️ आज भारत में यदि किसी को देशद्रोही, देश का विनाशक, हिंदू धर्म को
नष्ट करने वाला और हिंदू-हिंदू को बाँटने वाला कहना है तो वह मैं हूँ। गोलमेज काउंसिल गहराई से सोचेगी, तब उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि डॉ. आंबेडकर ने देश के लिए कुछ किया है। यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं उन्हें कोई भाव नहीं दूँगा। मेरे काम पर मेरे समाज का भरोसा मेरे लिए महत्त्वपूर्ण है। जिस समाज में मैं पैदा हुआ, जिस समाज में जी रहा हूँ, वहीं मरूँगा। मैं उसी समाज के लिए काम करता रहूँगा। मुझे आलोचकों की परवाह नहीं है।
🗣️ मुझ पर आरोप है कि मैं देश के लिए काम नहीं करता। पिछले सौ वर्षों से सुधारक, प्रखर, शांत लोग देश के नाम पर अपनी जाति के लोगों का पेट भरने का काम करते हैं। इन लोगों ने मेरे समाज के लिए कुछ नहीं किया है। फिर ये लोग मुझसे राष्ट्र-कार्य की अपेक्षा क्यों करें? महाड़, नासिक और अन्य स्थानों पर सत्याग्रह ने मुझे विश्वास दिलाया है कि हिंदू लोगों का दिल ईंट की दीवार की तरह निर्जीव है। उनमें इनसान को इनसान कहने और दूसरों को बराबरी का हक देने की इच्छा नहीं है। पत्थर की दीवार पर अपना सिर मारो, अंत में खून निकलेगा, लेकिन दीवार की कठोरता कम नहीं होगी। आज तक हमने हिंदू देवी-देवताओं के दर्शन नहीं किए, तो हम मर नहीं गए, या कि हिंदू मंदिरों में जाने वाले कुत्ते, बिल्ली या गधे इनसान नहीं हो गए। अगर वे हमें नहीं छू सकते तो हम भी उन्हें नहीं छुएँगे।
😡🗣️ इस हिंदू धर्म ने हमारा जितना नुकसान किया है, उतना किसी महामारी ने हमारा नहीं किया। हम 2000 साल से हिंदू धर्म में हैं। हमने इसकी रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है, लेकिन हिंदू धर्म में हमारा मूल्य कौड़ियों का नहीं है। हमने जो संघर्ष शुरू किया है, वह केवल मंदिर खुलवाने या तालाब का गंदा पानी पीने के लिए नहीं किया है। हमें ब्राह्मण के घर नहीं जाना है, हमें सहभोजन नहीं करना है। हमें ब्राह्मण लड़कियाँ नहीं चाहिए। क्या हमारे समाज में लड़कियाँ नहीं हैं? हमें ब्राह्मण लड़कियों की उम्मीद क्यों करनी चाहिए? क्या हमारी महिलाओं के बच्चे नहीं होते ? दरअसल हमारा आज का संघर्ष राजनीतिक सत्ता के लिए है। मुझे अब हिंदुत्व पसंद नहीं है। मेरा मन धर्म-परिवर्तन को हो रहा है। मैं जहाँ भी जाता हूँ, अपने साहस के दम पर जा सकता हूँ।
सन्दर्भ पुस्तक:- मेरी आत्मकथा मेरी कहानी, मेरी जुबानी।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर
🙏🙏🙏🙏🙏🅰️🅿️
:- ए पी सिंह निरिस्सरो
जय भीम जय भारत जय संविधान

