मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
25 दिसंबर 1927 मनुस्मृति दहन दिवस एक ऐसा शुभ दिन जहां से परम पूज्य, बाबा साहब डॉ० अंबेडकर ने एक ऐसी किताब मनुस्मृति का दहन कर दिया इसी दिन से भारत की समस्त नारियों कों नरक से मुक्ति दिलाने, शोषितों,पीड़ितों, वंचितों को उनके अधिकार प्राप्ति के लिए क्रांति की शुरुआत की।
25 दिसंबर 1927 को महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र कोंकण के एक छोटे से शहर/गांव महाड़ ने इतिहास रच दिया मनुस्मृति जलाने के लिए पहले से ही बेदी बनाई गई थी इसे तैयार करने में 6 लोग 2 दिन से मेहनत कर रहे थे 6 इंच गहरा और डेढ़ फुट चौकोर गड्ढा खोदा गया और उसमें चंदन के टुकड़े भर दिए गए। इसके चारों कोनों पर खंबे गाड़े गए जिन पर तीन तरफ बैनर लगे थे बैनरों पर लिखा था….. मनुवाद को नष्ट करें, और इस्पृश्यता को नष्ट करें, ब्राह्मणवाद को दफना दें ।
25 दिसंबर 1927 को देर शाम सम्मेलन में मनुस्मृति को जलाने का प्रस्ताव डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के सहयोगी ब्राह्मण गंगाधर नीलकंठ सहस्त्र बुद्धे द्वारा पेश किया गया था और अछूत नेता पीएन राजाभोग ने इसका समर्थन किया था इसके बाद मनुस्मृति को इसी चिता पर रखा गया और जला दिया गया अंबेडकर के ब्राह्मण सहयोगी गंगाधर नीलकंठ सहस्त्र बुद्धि और 5-6 अन्य दलित साधुओं ने यह कार्य पूरा किया।
उसी जगह पर अपने ऐतिहासिक भाषण में बाबा साहब डा०अंबेडकर ने कहा उन्होंने उच्च वर्णों से अपील की…. कि वे इस सामाजिक क्रांति को शांतिपूर्वक होने दें। शास्त्रों को त्याग दें, और न्याय के सिद्धांत को स्वीकार करें इसके बाद ही मनुस्मृति की प्रति को जला दिया गया।
लेखक:सामाजिक चिंतक ,भावना सिंह जनपद एटा उत्तर प्रदेश

