वीर बाल दिवस मनाने के उद्देश्य क्या है?
मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
वीर बाल दिवस हर साल 26 दिसंबर को मनाया जाता है, जो सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के चार बड़े साहिबजादों की याद में मनाया जाता है। इस दिन को साहिबजादा दिवस के रूप में भी जाना जाता है। गुरु गोबिंद सिंह जी के चार साहिबजादे थे। साहिबजादा अजीत सिंह, साहिबजादा जुझार सिंह, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह। इनमें से दो बड़े साहिबजादे, अजीत सिंह और जुझार सिंह, 1705 में चमकौर की लड़ाई में शहीद हो गए थे। दो छोटे साहिबजादे, जोरावर सिंह और फतेह सिंह, 1705 में सरहिंद के नवाब वजीर खान द्वारा दीवार में जिंदा चुनवा दिए गए थे। वीर बाल दिवस सिख समुदाय के लिए महत्वपूर्ण दिवस है। साहिबजादों की वीरता और बलिदान को याद करता है और सिख मूल्यों और परंपराओं को बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।
*वीर बाल दिवस कैसे मनाते है-*
- गुरुद्वारों में विशेष प्रार्थना सभाएं करके,
- साहिबजादों की शहादत के बारे में व्याख्यान और चर्चाएं करके,
- सिख इतिहास और संस्कृति पर प्रदर्शनियां लगाकर,
- सिख युवाओं के लिए खेल और सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित करके,
- सामुदायिक सेवा कार्यक्रम, जैसे रक्तदान शिविर और स्वच्छता अभियान आदि लगाकर वीर बाल दिवस मनाया जाता है ।
वीर बाल दिवस मनाने के उद्देश्य-
साहिबजादों की वीरता को याद करना
वीर बाल दिवस साहिबजादों की वीरता और बलिदान को याद करने के लिए मनाया जाता है। यह दिन उनकी शहादत को याद करता है और उनके बलिदान को सम्मानित करता है।
सिख मूल्यों और परंपराओं को बनाए रखना
वीर बाल दिवस सिख मूल्यों और परंपराओं को बनाए रखने के लिए मनाया जाता है। यह दिन सिख समुदाय को अपने मूल्यों और परंपराओं को याद दिलाता है और उन्हें बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।
युवाओं को प्रेरित करना
वीर बाल दिवस युवाओं को प्रेरित करने के लिए मनाया जाता है। यह दिन युवाओं को साहिबजादों की वीरता और बलिदान के बारे में बताता है और उन्हें अपने जीवन में साहिबजादों के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
सामुदायिक एकता को बढ़ावा देना
वीर बाल दिवस सामुदायिक एकता को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। यह दिन सिख समुदाय को एक साथ लाता है और उन्हें अपने मूल्यों और परंपराओं को साझा करने का अवसर प्रदान करता है।
इतिहास को याद रखना
वीर बाल दिवस इतिहास को याद रखने के लिए मनाया जाता है। यह दिन सिख समुदाय को अपने इतिहास को याद दिलाता है और उन्हें अपने अतीत को सम्मानित करने के लिए प्रेरित करता है।
बलिदान सप्ताह क्या है ?
21 से 27 दिसंबर तक बलिदान सप्ताह के रूप में मनाते हैं क्योंकि जिन्होंने सिख धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया था।
महीनों चली जंग में जब औरंगजेब को जीत हासिल न हुई तो उसने गुरु गोबिंद सिंह जी को पत्र भेजा कि मैं कुरान की कसम खाता हूँ कि अगर आनन्दपुर किले को खाली कर दो तो मैं बिना रोकटोक आप सभी को यहाँ से जाने दूँगा। गुरु गोबिंद सिंह जी ने किले को छोड़ना बेहतर समझा,लेकिन औरंगजेब ने धोखा दिया और उनकी सेना पर हमला कर दिया। सरसा नदी के किनारे लम्बा युद्ध चला और उनका परिवार बिछड़ गया।
1705 में 21, 22, और 23 दिसम्बर को गुरु गोविंद सिंह और मुगलों की सेना के बीच एक युद्ध पंजाब के चमकौर में लड़ा गया। वजीर खां गुरु गोबिंद सिंह को जीवित या मृत पकड़ना चाहता था। इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह की सेना में उनके दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह एवं जुझार सिंह और 40 अन्य सैनिक थे । इन लोगों ने मिलकर ही वजीर खां की पूरी सेना का विनाश कर दिया। वजीर खान गुरु गोविंद सिंह जी को पकड़ने में असफल रहा, लेकिन इस युद्ध में गुरु गोविन्द सिंह जी के दो पुत्रों साहिबज़ादा अजीत सिंह व साहिबज़ादा जुझार सिंह और 34 सिक्ख भी शहीद हो गए और मात्र 6 सिक्ख बचे।
इधर गुरुगोबिंद सिंह के छोटे साहिबजादे जोरावर सिंह और साहिबजादे फतेह सिंह दादी माँ गुजरी देवी संग जंगल से गुजरते हुए एक गुफा में ठहर गए। उनके पहुंचने की खबर लंगर की सेवा करने वाले गंगू को मिली और वो उन्हें अपने घर ले आया और अशर्फियों के लालच में उनकी मौजूदगी की जानकारी कोतवाल को दे दी। कोतवाल ने सिपाही भेजकर माताजी और साहिबजादों को कैदी बना लिया।अगली सुबह इन्हें सरहंद के बसी थाने ले जाया गया और इनके साथ इनके समर्थन में सैकड़ों लोग साथ चल रहे थे।
सरहंद में माताजी और साहिबजादों को ऐसी ठंडी जगह पर रखा गया, जहाँ बड़े बड़े लोग हार मान जाएँ इन्हें डराया गया, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी।
पूस का 13वां दिन…
नवाब वजीर खां ने फिर पूछा…. बोलो इस्लाम कबूल करते हो ? 6 साल के छोटे साहिबजादे फ़तेह सिंह ने नवाब से पूछा अगर मुसलमाँ हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न ? वजीर खां अवाक रह गया मुँह से जवाब न फूटा। साहिबजादे ने जवाब दिया कि जब मुसलमाँ हो के भी मरना ही है, तो अपने धर्म में ही,अपने धर्म की खातिर क्यों न मरें। तभी दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवाने का आदेश हुआ । दीवार चिनी जाने लगी। जब दीवार 6 वर्षीय फ़तेह सिंह की गर्दन तक आ गयी तो 8 वर्षीय जोरावर सिंह रोने लगा।फ़तेह ने पूछा, जोरावर रोता क्यों है डर गया क्या?जोरावर बोला, रो इसलिए रहा हूँ कि आया मैं पहले था पर धर्म के लिए शहीद तू पहले हो रहा है ।
इस तरह गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार 6 पूस से 13 पूस तक एक सप्ताह में धर्म के लिए ,राष्ट्र के लिए शहीद हो गया ।
पहले पंजाब में इस सप्ताह में सब लोग ज़मीन पर सोते थे क्योंकि माता गूजरी ने 25 दिसम्बर की वो रात दोनों छोटे साहिबजादों के साथ सरहिन्द के किले में ठंडी बुर्ज़ में गुजारी थी और 26 दिसम्बर को दोनो बच्चे शहीद हो गये थे। 27 तारीख को माता ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे।
लेखक: मदन मोहन भास्कर

