Thursday, February 26, 2026
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सत्य की खोज के लिए मनुष्य को मिले पूरी आजादी: डॉ. अंबेडकर

मूकनायक /देश

राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने दिनांक 8 जुलाई, 1945 को ‘पीपल्स एज्युकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की। केवल शिक्षा प्रदान करना ही नहीं वरन भारत में बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक प्रजातंत्र का प्रचालन सुचारू रूप से हो सके ऐसी शिक्षा देना इस सोसाइटी का उद्देश्य था। संस्था ने 20 जून, 1946 के दिन मुंबई में सिद्धार्थ कला एवं विज्ञान महाविद्यालय की स्थापना की।

सिद्धार्थ कॉलेज के पहले साल के अंत में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने भाषण दिया –

🗣️ उन्होंने भाषण में कहा- आपके प्रिन्सिपल साहब ने आपको बताया कि हमारा सिद्धार्थ कॉलेज शैशवावस्था में होने के कारण उसे अभी अपनी परंपरा निर्माण करनी है। मुझे व्याख्यान देने का मौका आप लोगों ने दिया है उसका फायदा उठाते हुए अब मैं ‘हमारे कॉलेज की परंपरा’ विषय पर ही करने जा रहा हूं। लेकिन अपनी बात शुरू करने से पहले मैं आजकल के छात्रों को दो शब्द कहना चाहता हूं। 1935 से 1937 तक दो साल मैं सिडनहॅम कॉलेज में प्रोफेसर था और इसी दौरान यहां के लॉ कॉलेज का भी मैं प्रिंसिपल था। 1937 के बाद छात्रों से मेरा संपर्क टूटा। तब से मैंने प्रोफेसर का पेशा छोड़कर राजनीति को अपनाया। राजनीति में मनुष्य को अपनी एक विशिष्ट मनोभूमिका बनानी पड़ती है। अपनी सोच को खास तरीके से ढालना पड़ता है। राजनीति में मनुष्य के लिए प्रचार कार्य करना बहुत जरूरी हो जाता है। लेकिन इसके खिलाफ प्रोफेसर कभी प्रचार कार्य नहीं कर सकता। प्रचारक कभी भी अध्यापक या प्रोफेसर नहीं बन सकता। अब चूंकि मैंने राजनीतिक प्रचारक का पेशा अपनाया है तो मुझे शक है कि मैं किसी विषय पर प्रोफेसर के नाते अपने विचार बेहतर ढंग से पेश कर पाऊंगा। लेकिन मुझे उम्मीद है कि आज का मेरा भाषण प्रचारक के तौर पर नहीं होगा।

🗣️ मेरी एक आदत है। जिस विषय पर मुझे बोलना होता है उसके सभी पहलुओं के बारे में पहले मैं अच्छी तरह सोच लेता हूं। लेकिन आज मुझे कबूलना पड़ेगा कि इस व्याख्यान से पहले इस प्रकार सोचने के लिए जितने समय की आवश्यकता होती है उतना समय और जितनी मानसिक शांति की जरूरत होती है उतनी मानसिक शांति मुझे नहीं मिली। कई लोग बिना वजह मिलने चले आते हैं और मेरा समय लेते रहते हैं। एक बात मैं पहले ही स्पष्ट करना चाहता हूं कि आजकल के छात्रों से मैं पूरी तरह निराश हूं। कुछ समय तक उनसे मेरे घनिष्ट संबंध रहे लेकिन जितना मैं उन्हें समझ सका, मुझे उनमें आस्था की कमी महसूस हुई। हमारे देश में एक समय ऐसा था जब गोखले, तिलक, रानडे, सर फिरोजशाह मेहता जैसे कई और आस्थावान, लगन वाले छात्र पैदा हुए। उनमें आस्था थी, उम्मीद थी, उत्साह था, अनुशासन था। उन्हें अपने ऊपर कुछ जिम्मेदारी है इसका पूरा अहसास था। लेकिन आजकल के छात्रों में यह अहसास या अनुशासन बिल्कुल नहीं है। आज तक मैंने कई छात्रों को पढ़ाया होगा। लेकिन अब कभी रास्ते में उनसे मुलाकात हुई तो वे गर्दन घुमा कर कहीं और का रुख कर लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। आपसी पहचान है यह वे दिखाना तक नहीं चाहते। कई कालेजों में व्याख्यान देने के लिए मुझे आमंत्रित किया जाता है। मैंने अब निश्चय किया है कि उनका आमंत्रण मैं अस्वीकार करूंगा। इसके लिए केवल सिद्धार्थ कॉलेज अपवाद है। सिद्धार्थ कॉलेज अपनी परंपरा को कैसे स्थापित करे यह अब मैं आपको बताता हूं।

🗣️ अपने कॉलेज का नाम सिद्धार्थ कॉलेज है। यही नाम क्यों रखा गया? नाम देने के बदले में किसी करोड़पति से मैं कुछ लाख रुपया अवश्य ले सकता था। लेकिन मैंने ऐसा सोचा नहीं। अगर मैं किसीसे रुपया लेता तो कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखना पड़ता। मैंने इस कॉलेज को सिद्धार्थ कॉलेज नाम देने का निश्चय किया, किसी अमीर से पैसा लेने का ख्याल मन में नहीं आने दिया। आप जानते हैं कि यह बुद्ध का नाम है, बचपन का। अपना यह सिद्धार्थ कॉलेज भी अभी छोटे बालक समान है। अभी उसकी नौ माह तक की उम्र नहीं हुई है। सो, अगर इस कॉलेज ने अब तक अपनी परंपरा को कायम नहीं किया है तो उसमें मुझे आश्चर्य की कोई बात नहीं नजर आती। लेकिन केवल इसी से आप यह अनुमान बिल्कुल न निकालें कि इस कॉलेज के सामने कोई लक्ष्य नहीं है।

🗣️ लक्ष्य के कारण ही इस कॉलेज का नाम सिद्धार्थ रखा है। इस बात को ध्यान में रखें। बुद्ध के नाम से इस कॉलेज की स्थापना क्यों की गई? क्योंकि, ब्रह्मजालसूत्र में बुद्ध ने ही यह उद्देश्य हमें बता रखा है। उस सूत्र में बताया गया है कि हम यह मान कर चलते हैं कि भारत में औपनिषदिक दर्शन का प्रसार हुआ है। इन दार्शनिकों का ब्रह्म में विश्वास है। एक बार कई ब्राह्मण दार्शनिक गौतम से मिलने आए। गौतम के शिष्यों ने अपने गुरु से कहा, “आपसे मुलाकात की उम्मीद लेकर वे ब्रह्मवादी दार्शनिक आपसे मिलने आए हैं। उन्होंने एक नए दर्शन की स्थापना की है और इस दर्शन के प्रमुख भगवान ब्रह्म है यह उनका दावा है। गुरुजी, इस बारे में आपके विचार क्या हैं यह हम सब जानना चाहते हैं।”

☸️ इस पर गौतम ने जो जवाब दिया वह विचारणीय है ऐसा मुझे लगता है। गौतम ने ब्रह्मवादियों से सवाल किया, ‘क्या आप लोगों ने ब्रह्म को देखा है?’ उन्होंने कहा, ‘नहीं।’ गौतम ने पूछा, ‘क्या आपकी ब्रह्म से बातचीत हुई है?’ जवाब मिला, ‘नहीं।’ गौतम ने पूछा, ‘क्या आपने ब्रह्म के बारे में कुछ सुना है?’ फिर जवाब मिला, ‘नहीं।’ गौतम ने पूछा, ‘क्या आपने ब्रह्म को चखा है?’ जवाब वही था, ‘नहीं’ तब गौतम ने उनसे कहा कि जब आप कहते हैं कि आपके पंचज्ञानेंद्रियों ने और पंचकर्मेंद्रियों ने ब्रह्म क्या है इसका अनुभव नहीं किया, तो फिर ब्रह्म है यह आप किस भरोसे कहते हैं? इस पर ब्रह्मवादियों से कोई जवाब देते नहीं बना।

🗣️ मैं आपको गौतम के एक और व्याख्यान के बारे में बताता हूं। महापरिनिब्बानसूत्र में इस बारे में विवेचन हुआ है। गौतम आसन्न मरण स्थिति में थे। उस दौरान उनके प्रमुख शिष्य कुशिनारा में रहते थे। उस वक्त उनके मुख्य शिष्य आनंद ने गौतम से कहा, ‘महाराज, आप इतनी जल्दी निर्वाण नहीं ले सकते। ऐसी कई बातें बाकी हैं जिनके बारे में आपने अपना निर्णय अभी हमें नहीं दिया है। हमारा मार्गदर्शन नहीं किया है!’ बुद्ध ने इसका जो जवाब दिया वह सचमुच विचारणीय है। उन्होंने कहा, ‘मैं चालीस सालों से आपके साथ रहा हूं। यानी मेरी उम्र अब पूरे अस्सी साल की है। इतने सालों तक मैं आपके संपर्क में रहा हूं इसलिए आपके कहने पर मुझे आश्चर्य हो रहा है कि अपने कुछ प्रश्नों के जवाब अभी भी आपको नहीं मिले हैं। सभी सवालों के जवाब आपको मुझसे नहीं मिले हैं यह मुझे असंभव लगता है। अपने चालीस साल के सम्बोधन में बताने लायक अभी कुछ बाकी रहा हो ऐसा मुझे नहीं लगता। आपके इस सवाल से आपके दिमाग में कुछ गड़बड़ है ऐसा मुझे लगता है। अब तक मैंने तुम्हें जो जो सिखाया वह आप पूरी तरह समझे नहीं ऐसा मुझे लगने लगा है। एक बात ध्यान में रखें और उसी के अनुसार व्यवहार करें, ताकि आपके सवाल आप खुद हल कर पाएंगे। यानी कि, कोई बात केवल मैं कहता हूं इसीलिए सत्य है ऐसा आप न मानें। आपकी विचारशक्ति,
आपकी तर्कशक्ति अगर उस बात को सच मानती हो तभी उसको स्वीकार कीजिए। वरना बेझिझक उसे छोड़ दीजिए। यही मेरी आपको सीख है।’

☸️ गौतम बुद्ध के इस कथन का क्या मतलब है? इसका मतलब यही है कि हर व्यक्ति को सोचने की आजादी है। उस आजादी का इस्तेमाल उसे सत्य को ढूंढने के लिए करना चाहिए और सत्य के मायने क्या हैं? व्यक्ति के पंच कर्मेंद्रियों और पंच ज्ञानेंद्रियों को जो सही लगे वही सत्य है। यानी कि, सत्य दिखाई दे, सुनाई दे, उसे हम सूंघ सकें, उसका स्वाद ले सकें और उसके अस्तित्व के बारे में हम लोगों को यकीन दिला सकें।

☸️ गौतम ने अपने शिष्यों के आगे यही उद्देश्य रखे थे। सिद्धार्थ कॉलेज भी इन्हीं लक्ष्यों का अनुसरण करने वाला है 1. सत्य को खोज निकालना,

  1. मानवता की सीख देने वाले धर्म का ही अनुसरण करना।

🗣️ आधुनिक विचार प्रणाली किस दिशा में आगे बढ़ रही है मैं जानता हूं। मैं आपसे यह भी कह देता हूं कि कार्ल मार्क्स के दर्शन से भी मैं अवगत हूं। उसके धार्मिक विचारों के बारे में भी मैं जानता हूं। धर्म को वह अफूकहता है। लेकिन उसका यह कथन मुझे स्वीकार नहीं। सत्य को खोज निकालना यही सत्यधर्म होता है। सत्य और सत्ता परस्पर विरोधी बातें हैं। शास्त्र भी किसी बात को परिपूर्ण या अंतिम नहीं मानता। इसीलिए सत्य भी अधूरा होने के कारण कालानुसार बार-बार उसे खोजना क्रमप्राप्त है। इसी कारण दुनिया में पूरी तरह पवित्र कुछ भी नहीं।

🗣️ धर्म यानी सत्य यह हमें सीखना होगा। नहिसत्यात्परोधर्मः ! यानी, सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। हमारा लक्ष्य भी यही हो। हम किसी और को कभी दुख न पहुचाएं। यही हमारे धर्म की सीख होनी चाहिए। सत्य खोजने में व्यक्ति को पूरी आजादी मिले यही अपने इस कॉलेज का लक्ष्य हो।

:- बाबा साहब डॉ आंबेडकर
खण्ड 40 पेज 48
🙏🙏🙏🙏🙏🅰️🅿️
:- ए पी सिंह निरिस्सरो
जय भीम जय भारत जय संविधान

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