मूकनायक/ देश
*राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा*
💎 मुक्ति कौन पथे 🛣️
🚩 हिंदू धर्म, इस धर्म में हमारे पूर्वज थे, यह बात सही है। किंतु वे लोग स्वयं बुद्धि से, स्वयं प्रेरणा से, रहे इस बात को मैं नहीं मान सकता हूं। जिस देश में कई वर्षों से चातुरवर्णी व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मणों को विद्या पढ़नी चाहिए, क्षत्रियों को युद्ध करना चाहिए, वैश्य को व्यापार करना चाहिए, और शूद्रों को ऊपरी सभी वर्गों की सेवा ही करनी चाहिए। इस प्रकार का नियमबद्ध वर्णक्रम मत्थे मढ़ दिया गया था। इस वर्ण क्रम में शूद्र ,अतिशुद्र वर्ण के लिए न तो कोई विद्या थी, और न तो कोई धन और दौलत थी, और न तो अन्न(खाना) वस्त्र और निवास था।
👩🦰👨🦰 ऐसी विपन्न और नि:शास्त्र अवस्था में आपके जिन पूर्वजों को रहना पड़ा, उन्होंने यह वैदिक अर्थात ब्राह्मणी धर्म को स्वयं खुशी से अपनाया होगा, ऐसा कोई भी समझदार आदमी नहीं कह सकता है। क्या आपके इन पूर्वजों को ब्राह्मणी धर्म के विरुद्ध विद्रोह करना संभव हो सकता था? इस पर जरूर विचार होना चाहिए। यदि उनको इस ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध विद्रोह करना संभव था, फिर भी उन्होंने नहीं किया, तो यह मान सकते हैं, कि उन्होंने इस धर्म को स्वयं खुशी से अपनाया था वास्तविकता यह है, कि वह निरुपाय थे। वह लाचार थे। इसलिए उन्हें इसी धर्म में रहना पड़ा। यह बात निर्विवाद है।
👁️ इस दृष्टि से देखने पर ब्राह्मणी धर्म अर्थात हिंदू धर्म हमारे पूर्वजों का धर्म नहीं हो सकता है। ब्राह्मणी धर्म उनके ऊपर जबरदस्ती लादा गया था। यह एक गुलामी, दासता थी। हमारे पूर्वजों को इस धर्म में ही रखना यह क्रूर, खूनी पंजा था। हमारे पूर्वजों के खून का प्यासा था। हमारे पूर्वजों के पास इस गुलामी से मुक्ति पाने की क्षमता और साधन उपलब्ध नहीं थे। इसलिए उन्हें इस गुलामी के विरुद्ध विद्रोह करना संभव नहीं था। उन्हें गुलामी में ही रहना पड़ा। इसके लिए हम उन्हें दोषी नहीं ठहराएंगे। कोई उन पर रहम ही करेगा। किंतु आज की पीढ़ी पर उस प्रकार की जबरदस्ती कोई किसी के लिए भी संभव नहीं है। हमें हर तरह की स्वतंत्रता है। इस आज का सही सही उपयोग कर यदि इस पीढ़ी ने अपनी मुक्ति का रास्ता नहीं खोजा, तो यह जो हजारों साल से ब्राह्मणी अर्थात हिंदू धर्म की गुलामी है, इसको नहीं तोड़ा, तो मैं यही समझूंगा, कि उनके जैसे नीच, उनके जैसे हरामी और उनके जैसे कायर जो स्वाभिमान बेचकर पशुओं से भी गई गुजरी जिंदगी बसर करते हैं, अन्य कोई नहीं होंगे। यह बात मुझे बड़े दुख और बड़ी बेरहमी से कहनी पड़ती है।
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:- डॉ बी आर अम्बेडकर
13 अक्टूबर 1935
संदर्भ:- मुक्ति कौन पथे, पेज नंबर 30
🙏🙏🙏🅰️🅿️ निरिस्सरो
जय भीम जय भारत जय संविधान

