मूकनायक/ देश
*राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा*
बहुजनों के मसीहा, बहुजन नायक, क्रांतिकारी महान तपॅस्वी, महान त्यागी और वैज्ञानिक से बने समाजिक वैज्ञानी मान्यवर साहिब श्री कांशीराम जी के त्याग और संघर्ष भरे जीवन की दास्तान आपके साथ सांझा करते हैं।
ये घटना आज से करीब 43 साल पहले 30 जून 1980 की है। साहेब कांशी राम जी को महाराष्ट्र के नासिक में बामसेफ के कार्यालय का उद्घाटन करना था। सुबह 6:30 बजे का समय तय हुआ था। नियत समय पर साहेब आ गये। फीता काटने की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। जैसे ही साहेब रिबन काटने के लिए आगे बढ़े तो उन्होंने अचानक रिबन काटने से मना कर दिया। क्योंकि रिबन का रंग लाल था। साहेब ने लाल रिबन की जगह नीला रिबन लाने को कहा।
लेकिन उस वक्त सुबह के 6:30 बजे थे। एक कर्मचारी ने कहा कि जब तक दुकानें नहीं खुलेंगी, रिबन नहीं मिलेगा। साहेब ने दुकान खुलने तक इंतजार किया और जब करीब 10 बजे दुकान खुली तो फीता लाया गया तो साहेब ने कार्यालय का फीता काटकर कार्यालय का उद्घाटन किया।
बामसेफ का कार्यालय नासिक के सारणपुर रोड पर कल्पना होटल की इमारत में सिर्फ 2 कमरों का था। इस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक धारता बी एल कोकानी थे, जो आदिवासी समुदाय से थे और एक बहुत वरिष्ठ सरकारी अधिकारी थे। इस कार्यक्रम में सेंट जेवियर स्कूल, नासिक के संस्थापक फादर प्रचार पीटर लुईस, डी.के. खापर्डे, बी.डी. बोरकर आदि प्रमुख व्यक्ति भी उनके साथ उस समय मौजूद थे।
बाद में साहेब ने लाल रिबन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह भगवा रंग हिंदू धर्म की निशानी है, इसलिए आंदोलन को चलाने के लिए छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखना हमारे लिए बहुत जरूरी है। उसी दिन साहेब का दूसरा कार्यक्रम था, उस कार्यक्रम में साहेब जल्द से जल्द जाना चाहते थे। लेकिन उन्होंने अपने उद्देश्य से समझौता नहीं किया। शाम को ‘रचना विद्यालय’ के मैदान में एक सार्वजनिक सभा आयोजित की गई, जिसमें उन्होंने नासिक शहर की महानता पर प्रकाश डाला। साहेब नासिक को बॉम्बे-पुना-नासिक का 120 मील का त्रिकोण मानते थे, यानी महाराष्ट्र में अंबेडकरवादी आंदोलन का रैली बिंदु।
जिस धर्म में मनुष्य के आत्मसम्मान की पहचान को पाप माना जाता है वह धर्म नहीं बल्कि एक बीमारी है – कांशीराम साहेब।
प्रस्तुत करते है।
इंजीनियर तेजपाल सिंह
94177-94756
जुग पलटाऊ बहुजन महानायक
मैं कांशीराम बोलता हूं।
लेखक पम्मी लालो मजारा-95011-43755

