Thursday, February 26, 2026
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मैं किसी भी अपराध का समर्थन नहीं करता, लेकिन कई अपराधी ऐसे होते हैं जो सिस्टम से सघर्ष करते हुए अपराध करने को मजबूर हो जाते हैं

मूकनायक /देश

*राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा*

बहुजनों के मसीहा, बहुजन नायक, क्रांतिकारी महान तपॅस्वी, महान त्यागी, बहुजनों के मार्ग दर्शक और वैज्ञानिक से बने समाजिक वैज्ञानी मान्यवर साहेब श्री कांशीराम जी के त्याग और संघर्ष भरे जीवन की दास्तान हम आपके साथ सांझा करते हैं।

तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार की जड़ें हिला देने वाले चंदन और हाथी तस्कर/डाकू वीरप्पन (पूजमुनि स्वामी वीरप्पन) के साथ जंगल में साहेब की बैठक हुई, जिसके बाद महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ बामसेफ कार्यकर्ता, जो 35 वर्षों से साहेब के साथ मिशन पर थे। में काम किया, लहजा था।

वीरप्पन से मिलने जाने वालों में महाराष्ट्र के एक दिनकर समाज नेता भी थे। एक हजार से अधिक कैडर कैंप आयोजित करने वाले प्रतिष्ठित वरिष्ठ बामसेफ कार्यकर्ता के अनुसार साहेब ने बताया था कि उस वीरप्पन के साथियों ने मेरी और मेरे साथियों की आंखों पर पट्टी बांध दी और हम दोनों को जंगल में वीरप्पन के यहां ले गए, कई घंटे तक पैदल चलकर वहां पर पहुंचे थे।

साहेब ने अपने साथी को अधिक विवरण नहीं बताया। साहेब स्वयं सार्वजनिक मंचों से अक्सर कहा करते थे कि सरकार की नजर में वे उग्रवादी और डाकू हैं, लेकिन मेरे समाज की नजर में वे सम्माननीय लोग हैं। पंजाब में संत जरनैल सिंह जी भिंडरावाले, महाराष्ट्र में हाजी मस्तान और फूलन देवी से उनकी कई मुलाकातों का जिक्र मिलता है। जब साहेब कांशीराम जी बीमार थे तो फूलन देवी साहेब की खबर लेने बत्रा हॉस्पिटल गईं, उस वक्त साहेब ज़ो वीरप्पन से मिलने जंगल में चले गए।
एक बार जब वह हाथ में पीला झंडा लेकर साहेब की बैठक में पहुंचे तो साहेब ने पूछा कि वह पीला झंडा हाथ में क्यों रखते हैं ? तब युवक का जवाब था कि मैं दिनकर समाज से हूं। और ये पीला झंडा दिनकर समाज के लिए आस्था का प्रतीक है।साहेब ने गुस्से में उन्हें डांटा और कहा कि दिनकर-बिनकर कोई नहीं है, सिर्फ बहुजन समाज है। याद रहे कि दुनिया के सबसे कुख्यात डाकू वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को तमिलनाडु की सीमा से लगते कर्नाटक के गोपीनाथम में हुआ था।जब वीरप्पन को कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए डाकू बनने के लिए मजबूर किया तो उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। चंदन तस्कर वीरप्पन के जीवन में एक दिन ऐसा भी आया। तत्कालीन सरकारों को उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 5 करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा करनी पड़ी।आख़िरकार 18 अक्टूबर 2004 को एस टी एफ ने उसे अपने चंगुल में पकड़ लिया और मुठभेड़ में मार गिराया।

वे लोग इस देश की सामाजिक व्यवस्था से पीड़ित और अपमानित हैं। वे लोग अब अपने पैरों पर खड़े हैं- साहेब कांशीराम जी।

प्रस्तुत करते है।
इंजीनियर तेजपाल सिंह
94177-94756

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पुस्तक -मैं कांशीराम बोलता हूं।
पम्मी लालो मजारा (बंगा नवांशहर)।

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