मूकनायक/ देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
*सतिकारयोग माता बिशन कौर जी।*
बहुजनों के मसीहा,महानायक, क्रांतिकारी महान तपस्वी, महान त्यागी, बहुजनों के मार्ग दर्शक और वैज्ञानिक से बने समाजिक वैज्ञानी मान्यवर साहिब श्री कांशीराम जी के त्याग और संघर्ष भरे जीवन की दास्तान हम आपके साथ सांझा करते हैं।
घटना 1992 दिल्ली के हुमायूँ रोड पर स्थित कोठी नंबर 10 की है। वक्त शाम के लगभग 6 बजे का। पंजाब का एक लड़का पार्क में काम कर रहा था। उसे अचानक संदेश मिला कि उसकी माता का देहांत हो गया है। अचानक मिली दर्दनाक खबर ने लड़के को चौंका दिया। लड़के ने रोना शुरू कर दिया। उसके रोने की आवाज सुनके साहेब बाहर आ गए और पूछा कि क्या हुआ? तब बामसेफ के कुछ कार्यकर्ताओं ने बताया कि इस लड़के की माता का देहांत हो गया है। इतना सुनते ही साहेब ने बामसेफ के कार्यकर्ताओं को कहा कि इस लड़के के पंजाब जाने का फ़ौरन हर तरह से प्रबंध किया जाए। बामसेफ के कार्यकर्ताओं ने उसका भाड़े और हर तरह का प्रबंध करके उसे ट्रेन के रास्ते पंजाब की ओर रवाना कर दिया।
उसी रात लगभग 8:30 बजे साहेब रजिस्टर में कुछ लिख रहे थे जो कि चुनाव कमिश्नर को उपलब्ध कराया जाना था। काम करते-करते साहेब ने पवन कुमार फ़ौजी, जो कि हरियाणा के हिसार का रहने वाला था, जिसने साहेब से प्रभावित होकर डिफेन्स की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था, को कहा कि तू लकड़ी के स्केल से रजिस्टर पर मुझे लकीरे खींच कर देता चल। लकड़ी का मोटा-सा वह स्केल साहेब ने खुद बनवाया था। जब फ़ौजी रजिस्टर पर लकीरें खींच कर दे रहा था तब साहेब ने भरे हुए मन से कहा कि देखो, जब हम किसी मूवमेंट से जुड़ते हैं तब परिवार का अपमान भी सहना पड़ता है। मिशन की खातिर जज्बात मारने पड़ते हैं। आज इस लड़के की माँ नहीं रही, और एक दिन मेरी माँ ने भी मर जाना है। यह भी क्या पता कि मैं अपनी माँ की चिता में लकड़ी भी ना डाल सकूँ! साहेब के ये शब्द फ़ौजी को अचरज भरे लगे। उसके बाद फ़ौजी तीन दिन और साहेब के साथ रहा, और जाते-जाते साहेब से लकड़ी का स्केल माँग कर ले गया। फ़ौजी सालों तक, साहेब का भेंट किया हुआ स्केल, झोले में डालकर जहाँ भी गया, साथ ही लेकर गया।
21 दिसंबर, 2005 का फिर वह मनहूस दिन आया जिस दिन साहेब कांशी राम जी की माता बिशन कौर का देहांत हो गया। इसे संयोग ही कहिए कि साहेब के मुख से सहज स्वभाव 1992 में निकले शब्दों- क्या पता, मैं अपनी माता की चिता पर लकड़ी भी न डाल सकूँ!- के मुताबिक इधर माता का देहांत हो गया था और उधर उनका वेटा कांशी राम नामुराद बीमारी से पीड़ित लगभग सवा दो साल से बिस्तर पर पड़ा मौत की जंग लड़ रहा था। जब पवन कुमार फ़ौजी साहेब की माता बिशन कौर के अंतिम संस्कार पर पहुँचा तब माता बिशन कौर की जलती चिता के पास खड़े होकर उसे साहेब के सालों पहले कहे हुए अलफ़ाज याद आए- क्या पता, मैं अपनी माता की चिता पर लकड़ी भी न डाल सकूँ!- फिर उसे उस वक्त याद आया कि सालों पहले साहेब ने मुझे जो लकड़ी का स्केल भेंट किया था, शायद वह इस दुखद घड़ी के लिए ही भेंट किया था। फ़ौजी ने उसी वक्त लकड़ी का स्केल अपने झोले से निकाला और माता के चरणों की ओर खड़े हो कर जलती हुई चिता पर कुछ यूँ समर्पित किया, “यह लीजिए माता जी, आपके बेटे (कांशी राम) द्वारा भेजा हुआ लकड़ी का टुकड़ा! क्या हुआ अगर आपका कांशी राम आज खुद चलकर लकड़ी डालने नहीं आ सका। लेकिन इस लकड़ी के टुकड़े को हाथ तो तेरे बेटे के ही लगे हुए हैं।”इसको स्वीकार करना माता जी।
इतिहास का रुख बदलने वाले जुझारू लोग मुश्किलों से कभी भी नहीं घबराते बल्कि उनका आखिरी दम तक डटकर मुकाबला करते हैं और फ़तह हासिल करते हैं- साहेब कांशी राम
प्रस्तुत करते है
इंजीनियर तेजपाल सिंह
94177-94756
जुॅग पलटाऊ बहुजन महानायक
पुस्तक मैं कांशीराम बोलता हूं।
लेखक-पम्मी लालो मजारा-।
95011-43755
साहेब के जीवन के बारे में प्रतिदिन एक लेख प्रकाशित करते है। यदि किसी कारणवश वह आप तक नहीं पहुँच पाता है तो आप संदेश भेजकर मंगवा सकते हैं।

