Thursday, February 26, 2026
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कुशल–अकुशल आचरण

मूकनायक

देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”

एक समय भगवान राजगृह में वेणुवन कलंदकनिवाप में विहार करते थे।

तब वच्छगोत्त (वत्सगोत्र) परिव्राजक जहां भगवान थे, वहां गया, जाकर भगवान को सम्मोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे वच्छगोत्त परिव्राजक ने भगवान से यह कहा–

“भो गोतम! देर हो गई, आप गोतम के साथ मुझे कथा-संलाप किए। साधु, (अच्छा हो) आप गोतम संक्षेप से मुझे कुशल-अकुशल का (भलाई-बुराई) का उपदेश करें।”

“वत्स! मैं संक्षेप में तुझे कुशल-अकुशल का उपदेश करता हूं, विस्तार से भी तुझे कुशल-अकुशल का उपदेश करता हूं।

किंतु (पहले) वत्स! मैं संक्षेप से तुझे कुशल-अकुशल का उपदेश करता हूं, उसे सुन, अच्छी तरह मन में कर, कहता हूं।”

“अच्छा, भो!”– (कह) वच्छगोत्त परिव्राजक ने भगवान को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा –
”वच्छ (वत्स) ! लोभ अकुशल (बुराई, पाप) है, और अलोभ कुशल (भलाई, पुण्य) है। (1)

द्वेष अकुशल है, अ-द्वेष कुशल है । (2)

वच्छ!मोह अकुशल है, अ-मोह कुशल है। (3)

इस प्रकार वच्छ! यह तीन धर्म (पदार्थ) अकुशल हैं, और तीन धर्म कुशल।”

“वच्छ! प्राणातिपात (हिंसा) अकुशल है, और प्राणातिपात से विरत होना, कुशल है। (1)

वच्छ! अदत्तादान (चोरी) अकुशल है, और अदत्तादान से विरति कुशल । (2)

कामों (स्री-प्रसंग) में मिथ्याचार (दुराचार) अ-कुशल है,
काम-मिथ्याचार से विरति कुशल । (3)

वच्छ! मृषावाद (झूठ) अकुशल है,
मृषावाद-विरति कुशल । (4)

वच्छ! पिशुन-वचन (चुगली) अकुशल है, पिशुन-वचन-विरति कुशल । (5)

वच्छ! पुरुष-वचन (कठोर-वचन) अकुशल है,पुरुष वचन-विरति कुशल। (6)

वच्छ! संप्रलाप (बकवाद) अकुशल है,
संप्रलाप-विरति कुशल । (7)

वत्स! अभिध्या (लोभ, दुसरे की सम्पत्ति पर नजर) अकुशल है,
अन्-अभिध्या कुशल। (8)

वच्छ!व्यापाद (पीड़ा देना) अकुशल है,
अ-व्यापाद कुशल। (9)

वच्छ! मिच्छा-दिट्ठी (मिथ्या-दृष्टि, झूठी धारणा) अकुशल है,
सम्मा-दिट्ठी (सम्यक्-दृष्टि) कुशल। (10)

वत्स!ये दश धम्म अकुशल हैं, दस धम्म कुशल हैं।

“वच्छ! जब भिक्खु की तृष्णा प्रहीण (नष्ट) हो गई होती है, उच्छिन्नमूल, कटे-सिर-वाले-ताड़ जैसी अभाव-प्राप्त (लुप्त), भविष्य में-न-उत्पन्न होने लायक होती है; (तो) वह भिक्खु अरहत! क्षीण-आस्रव (जिस के चित्तमल नष्ट हो गए हैं), ब्रह्मचर्य (विमलचर्य) बस कर चुका, कृतकृत्य, भार-बह-चुका,
सत्पदार्थ को प्राप्त, भव-बंधन-तोड़-चुका, आज्ञा(परमज्ञान) द्वारा-सम्यक्-मुक्त होता है।”

नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref:Ref: मज्झिम-निकाय:
महावच्छगोत्त-सुत्त
08.11.2024

प्रस्तुत करते हैं: रवि शेखर बौद्ध मंडल प्रभारी मेरठ मूकनायक

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