मूकनायक
देश
*राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा*
उन्नीसवीं सदी अंग्रेजी काल में असम के एक नगर के टीले नुमा खंडहर की खुदाई में एक शिलालेख पाया गया था | जिसमें शाक्य मुनि तथागत बुद्ध को भारत नाम से संबोधन करके उनके कुछ उपदेश पाली भाषा- धम्म लिपि में लिखे हुए पाये गये थे | इसी से प्रेरणा लेकर कुछ इतिहास कारों ने विदेशी साहित्य और इतिहास की मदद से खोजा है कि हमारे देश का नाम भारत, बुद्ध के नाम से ही पड़ा है ।
बुद्ध के बाद उनके अनुयायियों ने बुद्ध की आभा से आलोकित देश का नाम आभारत कर दिया था ।
सम्राट अशोक के कार्यकाल में बुद्ध की आभा भारत के बाहर कई अन्य देशों तक पहुँच गयी । बुद्ध के धम्म का विस्तार हुआ, तब इस देश का नाम महा+ आभा+ रत यानी महाभारत पड़ गया । कालान्तर में महाभारत शब्द छोटा होकर भारत रह गया | लेकिन यह सब कब हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ ? इतिहास से गायब है ।
हमारे देश का पुरातात्विक एवं तथ्यपरक इतिहास दूसरी सदी से लेकर दसवीं सदी तक लगभग नौ सौ वर्षों तक का लगभग 95% तक गायब है ।इसे गुप्त काल कहा गया है । इसको अधिकतर काल्पनिक किस्से कहानियों का संग्रह मात्र ही कहा जा सकता है | क्योंकि इस काल के इतिहास में विक्रम वैताल, वैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी, राजा भोज व गंगू तेली आदि के अलावा कोई खास इतिहास देखने को नहीं मिलता है ।अन्यथा नौ सौ वर्षों के इतने बड़े समय में कम से कम 100 या 200 राजा महाराजाओं का वर्णन इतिहास में भी मिलना ही चाहिए था । इसलिये इस काल को इतिहास की नजरों से अंधकार युग कहना ही उचित प्रतीत होता है ।
अंग्रेजों के आगमन से पूर्व बहुत सी घृणित अमानवीय कुप्रथायें देश में प्रचलित थीं । जैसे बालहत्या, प्रथम पुत्र गंगादान प्रथा, हरिबोल, चरक पूजा, शुद्धिकरण प्रथा, देवदासी प्रथा,सती प्रथा आदि जिनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और बहुत से लोग जान भी चुके हैं | लेकिन ये सब बातें शै॔क्षिक इतिहास से गायब हैं ।
यहाँ पर यह प्रकट करना आवश्यक लगता है कि ज्यादातर कुरीतियों का असली कारण जातीय भेदभाव ऊँच-नीच तथा ब्राम्हण और गैर ब्राम्हण के आपसी हितों की टकराहट मात्र रही है । अब सबाल आता है कि ब्राम्हण और गैर ब्राम्हण क्या है । नौवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य पाल वंश (यहाँ पाल वंश का तात्पर्य जाति विशेष नहीं वल्कि वंश विशेष है) के शासन काल में विक्रम शिला विश्वविद्यालय के अस्तित्व में आते आते बौद्धिष्टों की हीनयान (कठिन यान) थेरवादी परंम्परा कमजोर हो चुकी थी । इसकी जगह सहज यान (महायान) का बोलवाला शुरू हो चुका था । इसी महायान से अनेक मार्ग शाखाएँ विकसित हुई | जैसे वज्रयान, तंत्रयान, नाथ संप्रदाय आदि । इस समय तक ज्ञान की उपाधियां जैसे धम्मानुयायी, बोधि धम्म, बोधिसत्व, अरिहन्त, चीवरधारी, थेरा, महाथेरा आदि भी बदल चुकी थीं ।महायान परम्परा के अनुसार नयी शैक्षिक योग्यता के आधार पर नयी उपाधियां प्रदान की जाती थीं । जैसे द्विवेदी त्रिवेदी चतुर्वेदी आचार्य उपाचार्य, मुख्य आचार्य, दीक्षित उपाध्याय आदि । ये चलन पूरे देश में शुरू हो चुका था । लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि परिवार का कोई एक सदस्य अगर आचार्य, दीक्षित या उपाध्याय हो गया तो पूरा परिवार अपने को वही उपनाम देने लगा। यहीं से श्रेष्ठता अथवा हीनता के भाव से जातियों ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया और इन उपाधि धारकों ने अपनी उपाधि की श्रेष्ठता के आधार पर वंशानुगत जाति के रूप में स्थापित कर लिया तथा गैर उपाधि धारकों को अपने से नीचा दिखाने की होड़ में वंशानुगत पेशे के आधार पर जाति सूचक नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया । यह अपनी पीढ़ी को स्ववर्ण, सवर्ण उच्च वर्ण वर्ग का मानते थे । शिक्षित होने के कारण राजशाही परिवारों के नजदीकी सलाहकार मंत्री महामंत्री बनने लगे । इन्हें हमेशा डर रहता था कि दूसरे वर्ग के लोग भी शिक्षित होकर कहीं हमारी बराबरी करके हमारे राजकीय पदों पर आकर हमारा स्थान न ग्रहण करने लगें | इसलिये दूसरों की शिक्षा पर पाबन्दी लगाने के लिए विश्वविद्यालयों को ही नष्ट करना शुरू कर दिया । अब तक उच्च वर्ग व निम्न वर्ग की जातीय पृथा की शुरुआत हो चुकी थी । फिर एक दूसरे से अलग होते चले गये | जिसका खामियाजा हम भारतीय आज भी भुगत रहे हैं । दुर्भाग्य से विक्रम शिला विश्व विद्यालय का 300 सालों का यह इतिहास गायब है । इसी काल में ही यानी 11वीं व 12वीं शताब्दी में या 13वीं सदी के शुरुआत में तक्षशिला नालंदा भरहूत उज्जैन जैसे सोलह भारतीय विश्वविद्यालय नष्ट कर दिये गये । नालंदा विश्वविद्यालय को आग के हवाले करने का दोषारोपण मुस्लिम आक्रान्ताओं पर है तो वाकी पन्द्रह विश्वविद्यालय किसने नष्ट किये ? यह इतिहास से गायब है ।
जब गैर सवर्णों की शिक्षा पर पूरी तरह पाबन्दी लग गयी । ये सभी अशिक्षित हो गये तो मनुवादियों ने अपना कपोल कल्पित मनगढंत धार्मिक पौराणिक साहित्य ग्रन्थ पुराणों का लेखन शुरू कर दिया और कथा भागवत के जरिये गैर सवर्णों जिन्हें शूद्र अछूत बहिष्कृत समाज बताया गया है उन पर थोप दिया ।
आज से लगभग दो सौ साल पहले अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी की ही घटनाओं में एक घटना दक्षिण भारत के ट्रावनकोर रियासत की है ।नम्बूदरी ब्राम्हणों का रियासत पर कब्जा था । गैर सवर्ण महिलाओं को केवल कमर ढकने तक का ही अधिकार था | नागेली की कहानी जिन्हें पता है वो जानते हैं कि किस प्रकार मूलाकरम यानी स्तन ढकने का कर ( ब्रैस्ट टैक्स ) के नाम पर जब उस नागेली निम्न जाति की शूद्र महिला के साथ ज्यादती की गयी तो उसने अपने स्तन ही काट दिये और मर गयी । यहाँ तक कि उसके पति चिरुकन्दन ने अपनी पत्नी की रक्षा न कर सकने के अफसोस में नागेली की जलती हुई चिता में कूदकर अपनी भी जान दे दी थी ।देश के इतिहास में यह पहली घटना थी कि किसी पति ने अपनी पत्नी की जलती चिता में कूदकर अपनी जान दी हो । नागेली का यह एक इतिहास उदाहरण मात्र है । ट्रावनकोर रियासत के सैकड़ों साल के इतिहास में ऐसे कितने अत्याचार हुए होंगे अनुमान लगाया जा सकता है ।
जब ऐसे अत्याचार के किस्से श्रीरंगपट्टनम के मुस्लिम शासक टीपू सुल्तान को सुनने को मिले ।तो उन्होंने ट्रावनकोर के शासक से भेंट करने की इच्छा प्रकट की | ट्रावनकोर रियासत में उनका शाही स्वागत किया गया उन्हें नगर भ्रमण कराया गया । ट्रावनकोर की सभी कुरीतियों लज्जा जनक प्रदर्शनों को अपनी आँखों से देखकर टीपू सुल्तान ने ट्रावनकोर शासक से आपत्ति दर्ज की ।ट्रावनकोर शासक के द्वारा अपनी धार्मिक मान्यता कहकर आपत्ति खारिज कर दी गई ।
वापस लौटकर टीपू सुल्तान ने ट्रावनकोर के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। टीपू की सेना में निम्न शूद्र वर्ग के सैनिकों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया ।ट्रावनकोर के 800 से अधिक पाखंडी और सैनिक मारे गए । तब जाकर इस घृणित प्रथा में कुछ कमी जरूर आयी | हालाँकि टीपू सुल्तान अठारहवीं सदी आते आते अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए शहीद हो गये थे ।फिर बाद में ऐसी घृणित प्रथाओं का चलन जारी रहा ।जो लगभग 1924 में पूरी तरह बन्द हो पाया था ।लेकिन पूरा घटनाक्रम इतिहास से गायब है ।
ऐसा ही इतिहास भीमा कोरेगाँव का है ।महाराष्ट्र नागपुर क्षेत्र पूना रियासत पर भी ब्राम्हण पेशवा बाजीराव का शासन था ।चितपावन ब्राम्हण यहाँ के सिरमौर थे ।गैर ब्राम्हण या गैर सवर्णों को सिर्फ और सिर्फ उनकी गुलामी ही करनी होती थी इसी गुलामी की भीख से जो भी मिल जाए उसी से परिवार का पालन पोषण करना होता था ।जो जातियाँ सवर्णों की नजदीकी गुलामी करती थीं उन्हें सेवा मूल्य तो पर्याप्त मिलता था लेकिन, उन्हें एक निश्चित समयावधि में कम से कम एक बार इन पाखंडी चितपावन ब्राम्हणों को अपने घर पर ब्रम्हभोज दावत देनी पड़ती थी ।
इस दावत में दान दक्षिणा के साथ साथ उस घर की कम से कम दो से पाँच कन्याओं महिलाओं को ब्राम्हणों को भोजन कराने के साथ साथ शारीरिक सेवा भी करनी पड़ती थी । ये अविवाहित कन्यायें 11 साल से अधिक अथवा वे विवाहित सुन्दर महिलायें जिनकी अब तक कोई सन्तान न हुई हो केवल वही सेवा योग्य समझी जाती थीं । अगर किसी एक घर में पर्याप्त और सुन्दर कन्यायें,महिलायें नहीं हैं तो पड़ोसी परिवार की महिलाओं को ब्रम्हभोज की सेवा के लिए शामिल होना पड़ता था ।
इस समय घर के बच्चों बूढ़ों व अन्य महिला पुरुषों को अपनी जाति के किसी दूसरे व्यक्ति के घर में रहना पड़ता था।क्योंकि सेवा वाली सभी कन्याओं महिलाओं को भोजन बनाने परोसने से लेकर शारीरिक सेवा तक निर्वस्त्र ही रहना पड़ता था । जिससे ये चितपावन ब्राम्हण यह सुनिश्चित करते थे कि कोई महिला अपवित्र अवस्था में तो नहीं है तभी सेवा स्वीकार करते थे |l। यह ब्रम्ह भोज व्यवस्था व शारीरिक सेवा दो या तीन दिन तक की हो सकती थी ।
जिन लोगों ने ऐसी घृणित क्रूर व्यवस्था का विरोध किया उसे ही समाज से बहिष्कृत कर अछूत घोषित कर दिया जाता था ।इनमें से ज्यादातर बहिष्कृत लोग महार जाति के थे । यही वो महार थे जिनके लिए नगरों में प्रवेश वर्जित कर दिया गया था ।अपरिहार्य कारणों से जब कभी भी इन लोगों को नगरों में जाना पड़ता था तो थूकने के लिए गले में मटकी बाँधनी पड़ती जिससे उनका थूक नगर के रास्ते में न गिर जाये कमर में झाड़ू बाँधनी पड़ती थी जो उनके पीछे पैरों के निशान मिटाती जाये ।ताकि किसी ब्राम्हण का पैर उस अछूत के पैर के निशान के ऊपर न पड़ जाये । और भी अनेकों ऐसे अत्याचार थे जिनका वर्णन कर पाना मुश्किल है ।
यही वो कारण थे जिसमें 500 महार वीरों ने भीमा कोरेगाँव की शौर्य गाथा लिख दी | एक तरफ सिर्फ 500 वीर महार दूसरी तरफ पेशवाई सेना के 28000 सैनिक ।लेकिन. 500 महार वीरों ने पूरी पेशवाई सेना का सफाया कर दिया ।हालाँकि इन महार योद्धाओं ने पेशवाओं के अत्याचार से निजात पाने के लिये अंग्रेजी सेना से मदद की गुहार लगाई थी ।लेकिन अंग्रेजों ने महारों के युद्ध में सीधी मदद करने या युद्ध में भाग लेने से इनकार कर दिया था ।फिर भी उन्होंने महारों को युद्ध कौशल सिखाने तथा युद्ध के लिए तलवारें देने की सहायता की थी | युद्ध के लिए महारों को पीछे से सपोर्ट भी किया था | लेखक अपने ही देश के आन्तरिक युद्ध हेतु किसी विदेशी की मदद लेने का समर्थन नहीं करता है इस युद्ध में लगभग 50 महार वीरों ने भी अपना बलिदान दिया था ।जिनके नाम वहाँ के विजय स्तम्भ पर अंकित हैं ।यह घटना 1 जनवरी 1818 की है ।
आश्चर्य है, हमारे देश की इतनी बड़ी घटना हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रम के इतिहास से गायब है ।
राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फूले ने अपनी किताब गुलामगीरी में इन महार योद्धाओं को महा+अरि यानी महारि लिखा है ।जो पेशवाओं का महान अरि (दुश्मन) है ।
आज के संवैधानिक वैज्ञानिक युग में हम सब भारतीय हैं ।फिर भी हमारी सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद, ऊँच-नीच, भेदभाव, शोषण आदि अभी तक कायम है । इसे हम सब को मिलकर ही दूर करना होगा | हमारे पुरखों ने जो अत्याचार किये अथवा सहे हैं ।उन सबका बदला हमें आज की पीढ़ी से नहीं लेना है ।हमें आपसी भाईचारा बढाकर समतामूलक समाज के सिद्धांत पर चलना चाहिए ।
बाबा साहब डा.भीमराव अंबेडकर जी ने भी अपने बचपन से लेकर शैक्षिक कामयाबी तक के समय में हजारों प्रकार के अत्याचार सहे थे । लेकिन कामयाबी के बावजूद उनके अन्तर्मन में किसी भी जाति वर्ग धर्म संप्रदाय के प्रति कभी द्वेष उत्पन्न नहीं हुआ | उनके द्वारा लिखे गये संविधान में भी कहीं भी किसी भी जाति या वर्ग विशेष के लिए कटुता का भाव लेसमात्र को भी देखने को नहीं मिलता है |
बाबा साहब प्रतिवर्ष 1 जनवरी को भीमा कोरेगाँव के शहीद वीरों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए भीमा कोरेगाँव के विजय स्तम्भ पर जाया करते थे ।
नमन है उन सभी महार शूर वीरों को ।
उन सभी राजा महाराजाओं वीर सपूतों को भी नमन है जिनका कार्यकाल, शासन व्यवस्था, रहन सहन आदि सब कुछ किसी दुर्भावना के कारण हमारे देश के इतिहास से गायब है ।
लेखक::::
देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

