Thursday, February 26, 2026
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दहेज की भेंट चढ़ी हूं मैं…….

मूकनायक

राजस्थान /कोटा

नेशनल प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा

नदी किनारे खड़ा कवि था
एक लड़की का शव तैरता जा रहा था
कवि ने पूछा, “कौन हो तुम सुकुमारी?
क्यों बह रही हो नदी के जल में?”
कोई तो होगा तेरा अपना
इस भू तल पर
किस घर की तुम बेटी हो
किस क्यारी की तुम कली हो
किसने तुमको छला है बोलो
क्यों दुनियां छोड़ चली हो
तेरे हाथों में मेंहदी किसके नाम की है?
तेरे माथे पर बिंदिया किसके नाम की है?
तुम राजकुमारी लगती हो
या दैव लोक से आई हो
तुम्हारा रूप उपमा रहित है
कहां से लाई हो यह रूप?”

कवि की बात सुनकर लड़की की आत्मा बोलती है
कवि राज, मुझे क्षमा करो
गरीब पिता की बेटी हूं मैं
मृत मीन की भांति जल धारा पर लेटी हूं
रूप रंग और सुंदरता ही मेरी पहचान बताते हैं
कंगन चूड़ी मेंहदी बिंदिया सुहागन मुझे बनाते हैं

पिता के दुख को दुखी समझा
पिता के दुख में दुखी थी मैं
जीवन के इस पथ पर पति के संग चली थी में
पति को मैंने दीपक समझा और उसकी लौ में जली थी मैं
माता पिता के आंगन छोड़कर उसके रंग में रंगी थी मैं
पर वो निकला सौदागर लगा दिया मेरा भी मोल
धन दौलत और दहेज की खातिर जल में पिला दिया विष घोल

दुनियां रूपी इस उपवन में छोटी सी कली थी मैं
जिसको समझा था माली उसी के द्वारा छली थी मैं
ईश्वर से अब न्याय मांगने शव शैय्या पर पड़ी हूं मैं
दहेज के लोभी इस संसार में दहेज की भैंट चढ़ी हूं मैं

लेखक::::: आसाराम मीणा उप प्रबंधक एसबीआई कोटा

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