Thursday, February 26, 2026
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लक्ष्य पाने हेतु लक्ष्य के मार्ग पर चलना जरूरी है……..

मूकनायक

देश

ओमप्रकाश वर्मा


लक्ष्य पाने हेतु लक्ष्य के मार्ग पर चलना जरूरी है ——-
तथागत बुद्ध एक वर्षा काल में श्रावस्ती के पास अपने भिक्षु संघ सहित ठहरे हुऐ थे | भिक्षु संघ सहित श्रावस्ती के उपासक लोग नियमित उनके उपदेश सुना करते थे |
श्रावस्ती का ही एक धनी सेठ भी प्रतिदिन उनके उपदेश ध्यान पूर्वक सुनता और समय समाप्त होने पर वापस चला जाता था |
बुद्ध ने एक दिन उसे अपने पास बुलाया और उसके बारे में पूछा |
बुद्ध के पूछने पर उसने अपने नाम सहित बताया कि वह श्रावस्ती का एक धनी सेठ है |
बुद्ध ने पूछा कि आप यहाँ प्रतिदिन उपदेश सुनने आते हैं ?
सेठ ने कहा हाँ भगवान
बुद्ध – आपको यहाँ क्या मिलता है ?
सेठ – मुझे आपके उपदेश और आपके भिक्षुओं की आपकी ज्ञानवर्धक वाणियाँ अत्यंत प्रिय लगती हैं |
बुद्ध – उपदेश और ज्ञानवर्धक वाणियों से आप कौन सा लक्ष्य हासिल करना चाहते हो ?
सेठ – बुद्ध. मैं अपने जीवन में बदलाव करके लक्ष्य हासिल करना चाहता हूँ | मैंने सुना है कि जो लोग आपके उपदेश वाणियाँ सुनता है उसके जीवन में बदलाव आ जाता है | लेकिन मैं लगातार 15 दिनों से आपके उपदेश ध्यान से सुनता रहा हूँ पर मेरे जीवन में बदलाव नहीं आ रहा है और न ही अपना लक्ष्य प्राप्त कर पा रहा हूँ |
बुद्ध – आप क्या बदलाव चाहते हैं और आपके क्या लक्ष्य हैं ?
सेठ ने विस्तार से बताया – तथागत मैं श्रावस्ती के एक धनी सेठ का बेटा हूँ, मैं स्वार्थी अभिमानी घमंडी लालची और दूसरों से द्वेष रखने वाला हूँ | ये बुराइयाँ मुझसे दूर नहीं हो पा रही हैं | लोग मेरा सम्मान भी नहीं करते हैं और मेरे साथ चलना भी पसंद नहीं करते हैं | मैं यही लक्ष्य हासिल करना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में बदलाव आये, मेरे मन से राग द्वेष छल कपट पाखंड झूठ सब दूर हो जायें | लोग मेरा सम्मान करें , मेरे साथ रहना पसंद करें |
बुद्ध – क्या आपने हमारे या हमारे भिक्षुओं के उपदेश ध्यान पूर्वक सुने और उन्हें ठीक से समझा है |
सेठ – हाँ भगवान मैंने ठीक से सुने समझे हैं और बहुत से सूत्र कंठस्थ भी कर लिये हैं |
बुद्ध ने पूछा – मित्र आप कहाँ से आते हैं ?
सेठ – तथागत मैं श्रावस्ती के दूसरे छोर से आता हूँ |
बुद्ध – किस साधन से आते हो ?
सेठ – भगवान मैं बैलगाड़ी से आता हूँ |
बुद्ध – आने जाने में कितना समय लगता है ?
सेठ ने घड़ी के हिसाब से समय बताया | और बताया रास्ते में कुछ मोड़ और कठिनाइयां भी हैं |
बुद्ध ने सवाल पूछा | क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप यहीं पर बैठे रहें और आप अपने घर वापस पहुँच जायें अथवा अपने घर पर बैठे हुए ही यहाँ भिक्षु संघ में आ जाया करें ? इससे आप जल्दी और निर्विघ्न आ जा सकेंगे |
सेठ – ऐसा कैसे हो सकता है | हमें तो ऐसा असम्भव लगता है |
बुद्ध – फिर ऐसा कैसे संभव हो सकता है ?
सेठ ने कहा उसके लिए तो रास्ते पर चलना ही पड़ेगा |
बुद्ध – अब आप सही विचारों के पास पहुँच चुके हो | जिस प्रकार अपने गन्तव्य स्थान पर निर्विघ्न और जल्दी पहुँचने के लिये आपको सही मार्ग पर स्वयं चलना पड़ता है उसी प्रकार अपने जीवन के बदलाव और लक्ष्य प्राप्त करने के लिये धम्म पथ (सच्चाई के मार्ग ) पर स्वयं ही चलना पड़ेगा |
केवल तथ्यों से अवगत होने, सब कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेने के बावजूद अगर आप सही मार्ग पर नहीं चलते हैं तो लक्ष्य प्राप्त कर पाना असंभव ही है |
आदरणीय भाइयो- बहनों
राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने ध्यान साधना विपश्यना से 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व प्राप्त कर लिया था, वह 80 वर्ष तक यानी 563 ईसा पूर्व से 483 ईसा पूर्व जीवित रहे |
बुद्धत्व प्राप्ति के बाद 45 वर्ष तक वह सतत उपदेश देते रहे | उपरोक्त प्रसंग उनके उपदेशों का एक सरलतम उदाहरण है | हमें उनके इस उपदेश का मूल तत्व समझ कर उनके बताये मार्ग पर चलना चाहिए | केवल उनके बारे में जान लेने या ज्ञान हासिल कर लेने भर से हम लक्ष्य तक नहीं पहुँच पायेंगे |
यही नियम आज की बिषम राजनैतिक परिस्थिति पर भी लागू होता है | हमारे बहुजन समाज के साथी जय भीम नमो बुद्धाय, साहेब बन्दगी, जय संत रविदास, जय फूले, जय साहूजी महाराज, जय पेरियार रामासामी नायकर, जय पेरियार ललई सिंह यादव, जय मान्यवर कांसीराम साहब खूब बोलते हैं लेकिन उनके बताये मार्ग पर नहीं चलते हैं |
हम किसी भी महामानव, महापुरुष की विचारधारा पर चलते हैं | किसी जाति धर्म संप्रदाय की आस्था को ठेस पहुँचाने की क्या आवश्यकता है ?
अगर हम प्रकृति के नियमों तथ्यों से अवगत हैं तो हम उस मार्ग पर नहीं चलें जिसमें पाखंड अंधविश्वास है |
हम अगर बाबा साहब, मान्यवर कांसीराम साहब के अनुयायी हैं तो उनके बताये रास्ते पर चलें |
बाबा साहब ने कहा था –
पहले शिक्षित बनो
संगठित होओ
अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करो |
क्या हम उनके बताये रास्ते पर चल रहे हैं ?
हम बड़बोले तो हो रहे हैं, मगर शिक्षित जागरूक नहीं हो रहे हैं |
संगठित होने की बजाय हमने अनेकों संगठन बना लिये हैं |
जब हम संगठित ही नहीं हैं तो अन्याय अत्याचार होने पर भी हम आवाज नहीं उठा पाते हैं |
जिसका लाभ विरोधी ताकतें उठाती हैं |
मिलिन्द प्रश्न में यूनान के विद्वान राजा मिनाण्डर – बौद्ध भन्ते भिक्षु नागसेन से पूछते हैं –
हे भन्ते- किसी धम्म या धर्म को उच्च शिखर पर कैसे पहुँचाया जा सकता है ?
भन्ते नागसेन – महाराज उस धम्म या धर्म के गूढ़ तत्व समझने वाले व्यक्तियों की अधिक संख्या |
उस धम्म पथ पर चलने वाले योग्य प्रचारक |
राज सत्ता का संरक्षण |
साथियों अगर हम अपने मिशनरी लक्ष्य यानी बहुजन हिताय बहुजन सुखाय या फिर सर्वजन सुखाय को प्राप्त करना चाहते हैं | तो हमें अपने मिशन की पूरी जानकारी हासिल करनी होगी | हमें अपने महापुरुषों के बताये मार्ग पर चलना (परिश्रम करना) होगा | संगठित होना होगा |
शासन सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी | नहीं तो अन्याय अत्याचार उत्पीड़न शोषण होते देखकर भी हमें खामोश रहना पड़ सकता है |
हम सभी बहुजन भाई बहनों को लक्ष्य हासिल करने के लिए संकल्प लेकर संगठित होकर एक साथ और सही मार्ग पर चलना ही पड़ेगा |
तभी हमारी राजनैतिक रणनीति सफल होगी |
जय भीम नमो बुद्धाय
जय भारत जय संविधान
डी डी दिनकर अध्यक्ष
बीएसआई फफूंद

लेखक : देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247,
9415771347

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