मूकनायक
राजस्थान/ धौलपुर/ बसेड़ी
ओमप्रकाश वर्मा
केशरी लाल का जन्म 1 जनवरी 1939 को राजस्थान के धौलपुर जिले के पिपरोन गांव में दलित (चमार) परिवार में हुआ, जहां जातिवाद चरम सीमा पर था। दलितों की बस्तियां अलग होती थीं उस समय दलित परिवार का कोई भी व्यक्ति स्कूल जाने की हिम्मत नहीं करता था यदि किसी ने स्कूल जाने की हिम्मत भी की तो उसका अंजाम गांव के पूरे दलित समुदाय को भुगतना होता था। ऐसे समय में केशरीलाल ने स्कूल जाने का साहस किया सरकारी स्कूल गांव से करीबन 6 किलोमीटर दूर था जहां केशरी लाल जी पैदल ही जाया करते थे।
स्कूल में पढ़ने वाले उच्च जाति के छात्र केशरी लाल की पिटाई भी कर देते थे, पिटाई करने का कोई कारण नहीं होता था बस वे चमार थे और उच्चजाति के लोगों के साथ उन्होंने पढ़ने की हिम्मत जुटाई पिटाई का यही कारण होता था। स्कूल में कोई उच्चजाति का छात्र स्कूल के मटके से ऊपर से पानी डालकर पानी पिलाता था जिस दिन उच्चजाति का वह छात्र स्कूल नहीं आता उस दिन केशरी लाल जी को प्यासा ही पूरे दिन स्कूल में रहन पड़ता।
पढ़ाई के साथ साथ खेती – बाड़ी का काम संभालना भैंसों के लिए चारा लाना और खेतों पर पढ़ाई करना ही केशरी लाल की दिनचर्या थी । जब केशरी लाल जी कक्षा 10 वीं में थे, तब ही 6 दिसम्बर 1956 को संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर का निधन हुआ था, उस दिन उन्होंने स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टरों और उच्चजाति के विद्यार्थियों को यह कहते हुए सुना, कि आज हमारा दुशमान मारा गया और उच्चजाति के विद्यार्थियों ने इस बात की मिठाइयां बांटी. केशरी लाल उस दिन बहुत रोए, बाबा साहब का नाम तो उस वक्त गांव गांव में छा गया था गांव के लोग/ केशरी लाल उनके परिवार वाले और ससुराल वाले लोग भी बाबा साहब को सुनने आगरा आया करते थे. उस समय केशरी लाल जी ने प्रण लिया कि मुझे खूब पढ़ाई करनी है और बाबा साहब के रास्ते पर चलना है और समाज के लिए काम करना है और अपना जीवन समाज के लिए समाज के अधिकार सम्मान और न्याय दिलाने के लिए लगाना है।
10वीं पास करते ही केशरी लाल की नौकरी लग गई थी, उनके 10वीं पास करने पर गांव में हल्ला मच गया एक चमार ने 10वी पास कर ली, 10 वीं पास करना उसवक्त बहुत बड़ी बात थी । नौकरी में रहते हुए ही केशरी लाल अपनी कक्षा 11वीं और कक्षा 12वीं की स्कूली शिक्षा पूरी की और दिल्ली आकर दिल्ली के देशबंधु कॉलेज से BA और LLB शिक्षा पूरी की और उन्हें वकील की उपलब्धि मिली, तब से लोग उन्हें वकील साहब के नाम से जानने पहचानने लगे।
1960 में केशरी लाल जब दिल्ली आए तो सबसे पहले दिल्ली के अंबेडकर भवन पर पहुंचे यहीं से वे समाज के साथ/ सामाजिक संगठनों के साथ जुड़ते हुए चले गए।
उस समय केवल RPI और समता सैनिक दल था तो केशरी लाल उनके साथ जुड़े बाकी संगठन और राजनैतिक पार्टी तो बाद में आए। वे गांव से अकेले ही आए थे पर लोग उनके साथ जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। वे दिल्ली के कई बौद्ध विहारों के पदाधिकारी भी रहे ओर वहां पर उन्होंने अपनी सामाजिक व धार्मिक जिम्मेदारी पूरी लगन से निभाई.
समाज के लिए वे हर वक्त तैयार रहते, किसी की भी सहायता के लिए आर्थिक व क़ानूनी मदद के लिए व बहन बेटियों के शादी व्याह के लिए तन मन धन से हर वक्त तैयार रहते।
दिल्ली आकर एडवोकेट केशरी लाल ने बौद्धिज्म को समझा और बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। उन्होंने अपने आप को अपने आफिस में बौद्धिस्ट डिक्लेयर कर दिया। उन्होंने बुद्धिस्ट बनने को लेकर गजट ऑफ इंडिया नामक न्यूज़ पेपर में इश्तिहार दिया, और अपने नाम के साथ बौद्ध लगाना शुरू कर दिया। और लोग उन्हें बौद्ध एडवोकेट कहने लगे. नाम के आगे बौद्ध लगाने पर उनको उनके आफिस में कहा, कि सरकार के आदेशनुसार आप बौद्ध हो गया हैं इसलिए आप रिजर्वेशन का फायदा अब नहीं ले सकते और आपको प्रमोशन भी नहीं मिलेगा। इस बात पर एडवोकेट केशरी लाल बौद्ध ने अपनी सहमति दी और कह दिया मैं अब रिजर्वेशन का फायदा अब नहीं लूँगा. बौद्ध बनने के बाद एडवोकेट केशरी लाल बौद्ध ने अपने सभी बच्चों की पढाई सामान्य वर्ग के अनुसार स्कूल कि पूरी फीस देकर कारवाई। इसके बाद प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार आने के बाद एडवोकेट केशरी लाल बौद्ध को नौकरी में प्रमोशन मिला। लेकिन जब प्रमोशन मिला और वे गाजिस्टेट ऑफिसर बने तो एक साल ही रहे वे इस पोस्ट का फायदा उठा सके और 31 दिसंबर 1996 को रिटायर हो गए. काफी समय से एडवोकेट केशरी लाल बौद्ध छठा वेतन लागू होने का इंतजार कर रहे थे कि उनकी तनखा बढ़ेगी और परिवार के आर्थिक हालत सुधरेंगे लेकिन 1 जनवरी 1997 को छठा वेतन लागू हुआ। जब एडवोकेट केशरी लाल बौद्ध रिटायर हो चुके थे। रिटायर होने के बाद एडवोवेट केशरी लाल बौद्ध ने नोटरी के लिए अप्लाई किया और वे नौटरी ऑफिसर बन गए और अपने आखिरी समय तक जरूरतमंदों की सहायता करते रहे। समाज की सेवा करते करते ही 86 की उम्र में 19 सितंबर 2024 कोदिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली और दुनिया से विदा हो गये ।
86 उम्र के लंबे सफर में उन्होंने जातिवाद/ गरीबी/ अर्थिक परेशानियों को बहुत पास देखा परंतु हार नहीं मानी।
जब ऐडवोकेट केशरी लाल बौद्ध सरकारी नोकरी में थे तो उनके ऊपर स्वम-पत्नी, छ बच्चे और अपने चारों भाइयों के परिवार का पालन पोषण किया, उनकी नौकरी जब लगी थी जब वे क्लर्क थे और करीबन 100 रूपए महीने से उनकी नौकरी लगी थी। इस छोटी सी नौकरी से उनके घर/परिवार व उनके भाइयों के परिवार का खर्चा पूरे नहीं हो पाता था, तो उनकी पत्नी लौंगश्री ने भी जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ली और उन्होंने दूसरों के खेतों में गांव में जाकर मजदूरी करना शुरू करना किया और बच्चों को पालन पोषण किया, लोंगश्री गांव में सुबह 3 बजे से उठ जाया करती थीं और उठकर सास-ससुर, जेठ-जिठानी उनके बच्चों और अपने बच्चों के लिए गहूँ पीसने का काम करतीं और उसके बाद दूसरे के खातों में जाकर मजदूरी करतीं ।
जब एडवोवेट केशरी लाल बौद्ध अपनी पत्नी लौंगश्री को दिल्ली लेकर आए तब दिल्ली में भी लौंगश्री ने बच्चों कि जिम्मदारी अपने कन्धों पर उठाई और दिल्ली में दूसरों के घरों में जाकर उपले बनाकर मजदूरी कर बच्चों का भरण पोषण किया।
पर जब ऐडवोकेट केशरी लाल बौद्ध नौटरी अफसर बने तब से लौंगश्री और उनके बच्चों की जिन्दगी में सुधार आया।
आज दोनों दंपति के बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं, इनका सबसे बड़ा बेटा अशोक कुमार बौद्ध SDM ऑफिस में एफिडिवेट बनाने का काम करते हैं, उनसे छोटा सुशील कुमार बौद्ध डॉक्टर है जिनकी गुड़गांव में डॉक्टर की अपनी दुकान है, तीसरा बेटा दिनेश कुमार बौद्ध भी पेशे से डॉक्टर हैं और उनका ज्यादा समय घर पर माता पिता की सेवा में ही लगा रहा, चौथा बेटा राज कुमारा बौद्ध जो वकील है और हाल ही में उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की है, (अभी तक पिपरोन गांव में किसी ने PHD नही की है) पांचवे नंबर की बेटी सुजाता बौद्ध दिल्ली के बत्रा हॉस्पिटल में नर्स (सुपरवाइजर) हैं और सबसे छोटी बेटी सुमेधा बौद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो दलित आदिवासी और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करती हैं।
ऐडवोकेट केशरी लाल बौद्ध ने गांव की उस लकीर को मिटाकर दुनिया से विदा हुए, जहां दलितों की बारात नहीं चढ़ सकती थीं , उच्चजाति वाले के दरवाजों के सामने से दलित दूल्हा घोड़ी पर नहीं चढ़ सकता था, जय भीम का नाम कोई नहीं ले सकता था और यही नहीं उच्चजाति के यहां से दलित की अर्थी तक नहीं जा सकती थी, ऐसे गांव में ऐडवोकेट केशरी लाल बौद्ध सभी जातियों को एकजुट कर जातिवादी नफरत की दीवार मिटाकर उनमें प्यार मोहब्बत के फूल खिलाकर गए हैं दलितों और उच्चजातियों के बीच भाईचारा बनाकर गए हैं.
इसलिए ऐडवोकेट केशरी लाल बौद्ध की अंतिम विदाई गांव के लोगों ने गुलाब के फूलों के साथ, जय भीम के नारों के साथ, वकील साहब अमर रहें के नारों के साथ, आंसुओं के साथ, ढोल नगाड़ों के साथ दी जिसमें सभी जातियों के हजारों लोग मौजूद थे क्या दलित और क्या उच्चजाति सभी सामान थे सभी साथ एक दुसरे के गले लग कर रो रहे थे व एक दुसरे के आंसू पौंछ रहे थे.

