Thursday, February 26, 2026
Homeठाणेजलता झुलसता आम नागरिक

जलता झुलसता आम नागरिक

मूकनायक

कीर्ति संध्या

महाराष्ट्र/ ठाणै

मैं एक आम भारतीय नागरिक हुॅ. मेरी रोजी, रोटी, शिक्षा, घर, जमिन, हवा, पाणी, तंदुरुस्ती, और जिवन मरण सभी कुछ लडखडा चुका हैं. मुझे लगता था मैं प्रजातंत्र में जी रहा हुॅ. कब हुकूमशाही हावी हुई पता ही नहीं चला. मैं कडी धुप मे मेहनत कर ईत्तीसी तनख्वाह कमाकर दुकान में कितना भी कम अनाज खरीदु तो मुझसे पहले से ही जीएसटी नामक जकात का भी पैसा जोडकर किंमत वसुली जाती है.**मैं जितना कमाता हुॅ उससे तो परिवार का पेट तक पुरा नहीं भरता फीर तो कपडे, और दुसरी जरुरतों के लिये मुझे हर महीना कर्जा उठाना पडता है. मेरे स्वास्थ के लिये सरकारी अस्पताल की लंबी लाईन मे तबियत और बिगडने लगती हैं. इलाज के लिये हर खिडकी पर भरनेके लिये पैसै कहा से लाऊ. उपर से सरकारी दवाईया बाहर के दवाई दुकानों मे जाती हैं. मुझे लगता हैं मैं बिना इलाज ही मर जाऊंगा.**मेरे भविष्य हेतु मुझे ही भुखा सोकर भविष्य निधी जुटानी पडेगी.. मेरे जैसै अगणित है. जो या तो प्रायव्हेट कंपनी में काम करते हैं या मेहनत मजदुरी करते हैं. उनके भविष्य का क्या? सरकारी स्कुलों मे शिक्षकों की नियुक्ती नहीं करते. या तो अनपढ शिक्षकों को बच्चों का भविष्य बिगाडने हेतु काम पर रखा जाता हैं. मेरे बच्चे मैं कैसै पढाऊ?**मैने भी लगातार मतदान किया. इसी आशा में की अब तो सरकारे बदलेंगी. हमारा राज आयेगा. गरीबों का न्याय होंगा. अन्न वस्त्र निवारा पर टॅक्स नहीं होगा. सारे सपने धरे के धरे रह गए. सभी क्षेत्र मे मनमानी होने लगी. भ्रष्टता बढने लगी.**फिर मैने गहराई से सोचा.**भारत देश नामक पेंड पर भ्रष्टाचार के किडे तो  पहले ही पडे थे. वह और तेजी से बढने लगे जब पहिला मोबाईल ५००रू  में मिलने सुरू हुं. . पुंजीपती, राजनितिक संविधान को छेडछाड कर छेद करके अपने हातपैर पसार रहे थे. फिर आधार कार्ड आया. जिसने सिर्फ सरकार को आधार दिया… जनता तो सरकारी कंम्पुटरों मे बॅंकौं में ब्लॅक लिस्ट होती गयी.. आधार से जनता की गतीविधीयों पर रोख ठोक लगने लगी और जनता सुस्त, मंद, बेहोशी होने लगी.**फिर आयी नोटबंदी. कॅशलेश इंडीया. वाह… पहले ही काले धन को सफेद करके नये नोट छपवाए , आपस में लेन देन करके फिर अचानक नोट बंदी की मटकी जनता के सर पर फोड दी. **भले ही घर मे अनाज ना हो चलेगा. मोबाईल बॅंकींग में पैसा जमा करना जरुरी हैं. फिर उसके लिये काम करके मरो. चोरी करो. डकैती करो. तन बेचो, मन बेचो, घर बेचो, खेतीबाडी बेचो, संतान बेचो. भेड बकरीया बेचो… कंगाल हो जावो. तंग आकर पेड से लटककर मर जावो… पर कर्जा चुकावो…और भारतीय सरकार पुंजी पतीकी तिजोरी भरने हेतु उसके कंपनी की चिजे महंगी करते जायेंगे. उनके कर्जै माफ किऐ जाऐंगे. उनपर मुकदमे होने नहीं दैंगै.. और मुकदमा हुंआ तो उन्हे ईत्तला कर देश के बाहर भगा दिया जायेगा ..सब घपले पे घपला.  किसी बात का कोई डर नही.पर बहोत हुआ…….अब और नहीं….**धर्मौं मे बाटने वाले, जातीयों को सताने वाले. विधायक, सांसद जनता को नहीं चाहीए…..जितना नुकसान दारु, तंबाखु, और नशीली चिजौं से होता हैं ना उससे सौ गुणा जादा नुकसान मौबाईल के सोशल और गंदी साईटे , पैसौं की चोरी, हॅकींग, साईट, दिमाग वालों ने पुरे भारत को ना जाने किन किन बातों का नशा करवा दिया… इतना की मोबाईल ना हूवा वो तो भाई, बहन, मां बाप, पती, यार और भगवान हो गया.  हम तो पैसा देखने को तरस गये रे…… पैसा तो फोन पर आकडों मे दिखने लगा. **अब तो मन करता हैं  मोबाईल टाॅवर पर चढकर कुद के मर जाऊ. मैं अनपढ हू तो मोबाईल ठीक से चलाना तक नहीं आता. और यहाँ सारे काम मशीने करने लगी… हाय… हाय… सिर्फ और सिर्फ बेरोजगारी, महंगाई, परेशानी, भुकमारी, गरीबी, अज्ञान, धर्मकांड, कायदे कानुन का अपमान सांसदों की मनमानी, पुंजीपतीयों की चांदी ही चांदी…..**क्या मतदान करते वक्त सोचेंगे क्षणभर…सिर्फ और सिर्फ नये, पढे लिखे, चतुर, जनता मे से गया हुवा, तेज तर्रार, अक्लमंद, ऐसे ही को विधायक बना के,  पक्षकार को जिता के सांसद में भेजना हैं. इतना ही मुझे अब लगता है. ताकी मेरी व्यथा वह समझेगा, सुलझाएगा. उसपर उपाय करेगा.     —  आम भारतीय नागरीक.            जय भारत. जय संविधान….      किर्तीसंध्या✍️ठाणे.महाराष्ट्र.          (७०८३३५१७२५/८४२१७५२३१५)

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments