✍ राजेश कुमार बौद्ध
रतन लाल जी ने जो भी मेश्राम जी के बारे मे सही बोला, बावन मेश्राम जी ने खुद बोला है कि जब कांशीराम जी ने मायावती को आगे बढ़ाना शुरू किया तो हम लोग पीछे हटे। अर्थात इनको आगे बढ़ाते तो ये लोग नही हटते।जिस बामसेफ को कांशीराम जी ने रजिस्टर्ड नही कराया उनको इन लोगो ने रजिस्टर्ड करवाया मेश्राम जी का कहना है कि कांशीराम जी ने पार्टी बनाई इसलिए वे लोग हटे।
फिर सवाल ये है की फिर बामसेफ किस लिए बनी? क्या केवल ब्राह्मण देशी है विदेशी है इस पर बहस के लिए बाबा साहब डॉ अम्बेडकर जी ने कभी अपना पसीना नही बहाया जब संविधान सभी को समान नागरिकता देता है तो फिर देशी विदेशी का मुद्दा ही खत्म हो जाता है। इस विषय पर मेश्राम जी खुद संविधान विरोधी है।
बीजेपी के राज मे आरएसएस, बीजेपी, हिंदुत्व या देवी देवताओं पर सवाल उठाने वाले को जेल भेज दिया जाता है। वही उनके देवी देवताओं को खुलेआम मंचो से ललकार ने पर मेश्राम जी के खिलाफ कुछ नही होता?जब मेश्राम जी ने कांशीराम जी का साथ छोड़ दिया, फिर उनका फ़ोटो अपने रैली में लगाने का क्या मतलब हैं ? साथ छोड़ने का मतलब कांशीराम जी गलत थे, फिर गलत आदमी का फोटो अपने रैलियों में क्यो ? यदि सही थे तो फिर साथ क्यो छोड़ा? यदि कांशीराम जी पार्टी बनाकर सही नही किये तो ये मेश्राम जी खुद पार्टी क्यों बनाये ? उनका कहना था 2017 और 2022 के इलेक्शन में पूरे देश मे EVM मशीन तोड़ेंगे। कितने EVM मशीन टूटे ? जब मेश्राम जी 100% 23 कैरेट सोने (gold ) है तो आज तक एक भी विधायक क्यों नही जीता ?
महाराष्ट्र के लोग सबसे ज्यादा बाबा साहब को मानते हैं और मिशन चलाते हैं तो फिर बहुजनों की सरकार महाराष्ट्र में अब तक क्यों नहीं बनी? महाराष्ट्र के ही मिशनरी लोग रामदास अठावले, राजरत्न अम्बेडकर, बावन मेश्राम जी एक क्यों नहीं होते ? जिस कम्युनिस्ट विचार धारा को बाबा साहब ने ठुकरा दिया उसी विचार धारा को क्यों लेकर ढो रहे है ? बाबा साहब के मिशन का सबसे ज्यादा चिरहरण महाराष्ट्र में क्यों हुआ? यहां तक बाबा साहब के मिशन को आगे बढ़ाने वाले लोग ज्यादा है अर्थात महाराष्ट्र में मेश्राम, रामदास आठवले या प्रकाश अम्बेडकर जी जैसे लोग सरकार क्यों नहीं बनाते ? क्या महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात या साउथ हो बसपा की सरकार है ? यदि नही तो मेश्राम जी या किसी अन्य प्रदेशो में पसीना बहाने से कौन रोकता है ? सबको उतर प्रदेश ही क्यों दिखाई देता है ? बसपा ध्दारा तैयार किया गया फसल सब काटने के लिए तैयार है, लेकिन जमीन फसल उगाने के लिए तैयार नहीं है, इनको बसपा को कमजोर करके क्या मिला ? बीजेपी मजबूत हुई परिणाम सामने है।
राजग सरकार में राज्यमंत्री रामदास अठावले दलित नेता के रूप में वो भी है, महाराष्ट्र का दलित समाज उन पर बड़ा भरोसा करता है मगर वे सदन में अपनी बेतुकी तुकबंदियों में ही अपनी सारी ऊर्जा बरबाद कर रहे हैं, दलितों की समस्याओं का समाधान उन के बस की बात नहीं है। उन्होंने क्रिकेट में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए 25 फीसदी आरक्षण की मांग जरूर रखी थी, जो कभी पूरी होगी ऐसा लगता नहीं है।
एक बिहार में पैदा हुआ था मिशनरी नेता ” रामविलास पासवान ” उन्होंने कहा था ” मैं उस घर मे दिया जलाने चला हूँ, जहाँ वर्षो से अंधेरा है। उन्होंने आखिरी सांस आरएसएस की गोद मे ली। उन्हीं बेटा एक ” चिराग पासवान ” है, जो आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाने में एक कदम आगे हैं। एक उतर प्रदेश मे मिशनरी पैदा हुआ उदितराज उर्फ रामराज। वैसे उनका पुराना नाम है रामराज हैं, उनको राम से इतनी नफरत हुई कि उन्होंने राम की जगह उदित कर दिया। जीवन भर ब्राह्मणवाद का लोटा फोड़ते रहे, आखिरी पारी बीजेपी में खेली। दिल्ली की एक सुरक्षित सीट से सांसद बने। जब सांसद बने तो बीजेपी सही थी। जब दुबारा टिकट नही मिला और बीजेपी से दुत्कारे जाने के बाद तो बीजेपी बुरी हो गई ? अब कभी कभी अखबार और टीवी में दलितों पर चर्चा कर लेते हैं।
वहीं पांच बार लोकसभा सांसद और स्पीकर रह चुकी मीरा कुमार से भी दलित समाज को क्या मिला ? उप प्रधानमंत्री रह चुके बाबू जगजीवन राम जी की बेटी मीरा कुमार ने साल 1985 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर से चुनावी राजनीति में प्रवेश किया था और पहले ही चुनाव में रामविलास पासवान और मायावती जी को भारी मतों से हराया था, दलित नेता के रूप में दलित समाज को उन से काफी उम्मीदें थी, मगर वे कभी अपनों को उम्मीद पर खरी नहीं उतरती हैं?
अब आइये पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले की। बीजेपी से सांसद चुनी गई, तो बीजेपी सही। जब दुबारा टिकट नही मिला तो बगावत। बीजेपी बुरी हो गई।अब आइये दलितो में उभरता मसीहा रावण से मिलते हैं। कांशीराम जी 10 साल तक गैर राजनीतिक दल अर्थात बामसेफ और DS-4 बनाकर समाज को जोड़ा और बड़े संधर्ष के बाद में बसपा बनाया। ये जनाब उनके भी गुरु निकले 2 साल तक प्रतीक्षा नही कर सकते थे, तुरंत पार्टी बनाकर मैदान में कूद पड़े और मनुवादी अखिलेश के चरणों मे जा गिरे।
घिघियाने लगे कि प्रभु 5 न सही केवल दो ही सीट दे दो।
हाय रे कांशीराम जी के चेलों ? तुम्हें चेला काहू या….. ?
कांशीराम जी के चेलों ने बसपा से हटकर दर्जनों पार्टी बना दी।
दलित समाज का नेतृत्व करने वाली एक राष्ट्रीय पार्टी बसपा हैं, समाज के ही मिशनरी लोगो ने चिरहरण करने से बाज नही आये दलित अधिकारी, मिशनरी, कांग्रेस, बीजेपी, आरएसएस, ओबीसी, हिन्दू, मेश्राम, पढे लिखे लोग, रिटायर्ड प्रोफेसर, शिक्षक सभी के निशाने पर केवल एक पार्टी व एक नेता बसपा व बहन जी ही क्यों?मैं किसी भी पार्टी का संवैधानिक सदस्य नही हूँ। क्योंकि हम केवल एक पार्टी के वोटर और सपोटर हैं। मेरा काम सच को सामने लाने का है। लेकिन याद रखो, जिस दिन बसपा खत्म हो गई उस दिन ठीक से समझ मे जायेगा। अपने अपने नेताओ की गुलामी छोड़िए जब ये नेता अपने समाज के खातिर एक नही हो सकते तो फिर इनका गुणगान क्यो ? नारा कब तक लगाते रहेंगे ?अपने जेहन के आईना में झाँक कर देखिये। सच्चाई खुद ब खुद दिख जायेगी।
भाजपा को जिताने में बसपा का हाथ कहने वाले बसपा के सपोर्टर हैं अथवा बसपा के विरोधी अगर बसपा के सपोर्टर हैं तो कभी भी बसपा को कमजोर बनाने को नही सोचेगा, लेकिन अगर बसपा के विरोधी है तो खुद बखुद ही समाज के दलालों में शुमार हो जाते हैं ! क्योंकि बसपा और बसपा के समर्थक कभी समाज का नुकसान कर नही सकते। समाज का नुकसान हुआ ! बसपा कमजोर हुई, तो अपने बेसवोट को तोड़ने वाले समाज के गद्दारों से अब खुद ही आकलन कीजिये आप समाज के हितैषियों में शूमार है अथवा समाज को गुमराह करने वाले बिचौलिये कि जमात में ?
बसपा को हारने और और भाजपा को जितने का कारण मनुवादियों द्वारा समाज मे दलाल पैदा करना है जिससे वोटों का बंटवारा हुआ। बहुजन समाज के वोटों को तोड़ने के लिए मनुवादियों द्वारा जातिवार नेता पैदा करना एवं उनकी जातिवार पार्टियां बनाना जैसे ओमप्रकाश राजभर- सुभासपा, अनुप्रिया पटेल एवं उनकी पार्टी, निषादराज पार्टी एवं दलितों और पिछड़ों के न जाने कितने नेता और पार्टियों का उगना और मनुवादियों का सपोर्ट कर उनकी पार्टी बीजेपी को जिताना ही बसपा की हार व भाजपा के जीत के कारण है।आप कौन है ? किस कारण में फिट बैठ रहे हैं ? खुद ही समीक्षा कीजिए। लेकिन बसपा के साथ ही साथ कई और दलितों के नेता है उन पर भी सवाल खड़े किये जा सकते हैं केवल मायावती पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है।
राजेश कुमार बौद्ध
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