मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता है। हर किसी में कुछ ना कुछ कमियाँ जरूर होती हैं। रचनात्मक आलोचना हमें हमारी उन गलतियों और कमजोरियों से अवगत कराती है, जिन्हें हम खुद नहीं देख पाते। यदि हम इसे सुनना ही बंद कर देंगे, तो हमें अपनी कमियों का कभी अहसास नहीं होगा और हम सुधार की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाएंगे। अहंकार की वृद्धि आलोचना को खारिज करने से व्यक्ति के भीतर ‘मैं ही सही हूँ’, का झूठा अहंकार पनपने लगता है। यह अहंकार व्यक्ति को नए विचारों, दृष्टिकोणों और सीखों को स्वीकार करने से रोकता है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े विद्वान और शासक केवल इसलिए पतन का शिकार हो गए क्योंकि उन्होंने सही समय पर अपनी आलोचनाओं पर ध्यान नहीं दिया।
इसलिए सकारात्मक और नकारात्मक आलोचना के अंतर में यह समझना भी जरूरी है कि हर आलोचना दुर्भावनापूर्ण नहीं होती। जहाँ कुछ आलोचनाएँ केवल नीचा दिखाने के लिए की जाती हैं, वहीं बहुत सी आलोचनाएँ रचनात्मक होती हैं, जो शुभचिंतकों द्वारा हमारे भले के लिए की जाती हैं। आलोचना एक कड़वी दवा की तरह है, जो स्वाद में तो खराब लगती है लेकिन जीवन को स्वस्थ और बेहतर बनाती है। आलोचना की उपेक्षा करना अपनी ही प्रगति की राह में दीवार खड़ी करने जैसा है। यदि हमें जीवन में लगातार आगे बढ़ना है और खुद का एक बेहतर संस्करण बनना है, तो हमें आलोचना को खुले दिमाग से स्वीकार करना होगा।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

