नीट (NEET) परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के कारण आज देश का भविष्य सड़कों पर रो रहा है। लाखों होनहार छात्रों का दिल टूटा है, उनकी बरसों की दिन-रात की मेहनत मिट्टी में मिल गई है और उनके परिवारों की गाढ़ी कमाई व आर्थिक स्थिति पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। ऐसे में देश के युवाओं का यह आक्रोश और गुस्सा पूरी तरह से जायज है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक नीट परीक्षा की कहानी है? बिल्कुल नहीं।आज देश का शायद ही कोई ऐसा कोना या ऐसी सरकारी परीक्षा बची हो, जहाँ पेपर लीक या धांधली का भूत न मंडरा रहा हो। कई परीक्षा केंद्रों (Exam Centres) का हाल तो यह है कि वहाँ का स्टाफ खुद चंद पैसों की खातिर सामूहिक नकल (Cheating) की खुली छूट दे देता है। पूरी शिक्षा और चयन व्यवस्था भ्रष्टाचार की दीमक से खोखली हो चुकी है।दुनिया बुरे लोगों की वजह से नहीं, अच्छे लोगों की चुप्पी से खराब हैइस महान देश की व्यवस्था आज इसलिए बर्बाद नहीं है कि यहाँ सिर्फ बुरे लोग या भ्रष्टाचारी बैठे हैं। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि— “दुनिया को बुरे लोगों से उतना खतरा नहीं है, जितना खतरा उन अच्छे लोगों से है जो आँखों के सामने बुरा होते हुए देखते हैं और चुप रहते हैं।”आज हमारे देश की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। जब हमारे सामने अन्याय या भ्रष्टाचार होता है, तो ‘अच्छे लोग’ अपनी आँखें मूंद लेते हैं, आवाज नहीं उठाते। और यदि समाज का कोई एक सजग नागरिक या पत्रकार इस अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का साहस दिखाता भी है, तो बाकी के ‘अच्छे लोग’ उसका साथ देने के बजाय तमाशबीन बने रहते हैं। इसी सामूहिक चुप्पी का फायदा उठाकर भ्रष्टाचारी तंत्र मजबूत होता चला जाता है।स्वामी विवेकानंद का संदेश: बकरी नहीं, शेर बनोमहान युवा चेतना के प्रतीक स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि— “बलि हमेशा असहाय बकरे की दी जाती है, जंगल के राजा शेर की नहीं।”अगर देश के युवा और आम नागरिक व्यवस्था के सामने लाचार और चुप बने रहेंगे, तो भ्रष्टाचारी तंत्र हर बार उनकी उम्मीदों की बलि चढ़ाता रहेगा। अब समय आ चुका है कि देश का युवा अपनी ताकत को पहचाने, इस अन्याय के खिलाफ ‘शेर’ की तरह गरजे और एकजुट होकर सच का साथ दे। उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपनी ईमानदारी और हक की लड़ाई जीत न जाओ।सरकार को युवाओं का दर्द समझने की जरूरत हैचल रहे देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों की भावनाओं, उनके टूटे हौसलों, बर्बाद हुए सालों और परिवारों की डगमगाती आर्थिक स्थिति के दर्द को गहराई से समझना होगा।केवल जाँच बिठा देना या खानापूर्ति के नियम बना देना इसका समाधान नहीं है। सरकार को पेपर लीक के खिलाफ बेहद कड़े और गैर-जमानती नियम जमीनी स्तर पर लागू करने होंगे। साथ ही, इस अनिश्चितता के माहौल में मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित हुए सभी पीड़ित छात्रों को एक वाजिब लाभ और न्यायपूर्ण समाधान तुरंत देना होगा।
लेखक:दुष्यंत सुरेश सांखरेसंवाददाता (रायपुर, छत्तीसगढ़)मूकनायक मीडिया

