हिंदी दलित कविता की विकास यात्रा में डाॅ.खन्नाप्रसाद अमीन की कविताओं का एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण योगदान है। प्रस्तुत काव्य-संग्रह ‘ सुनो दलित ‘ में संविधान प्रदत्त अधिकारों के लिए संघर्ष तथा दलित समाज को एकजुट होकर, शिक्षा प्राप्त कर आगे बढ़ने का आह्वान तथा अतीत के गहरे दंश हैं, साथ में इक्कीसवीं सदी के समय में भी दलित समाज को तथाकथित सवर्ण समाज का ‘काला अक्षर भैंस बराबर ‘ रखने की एक सूत्री योजना का पर्दाफ़ाश है। दलित समाज के आन्तरिक मुद्दों और दलित चेतना के व्यापक सवालों का, समाधान के साथ इस संग्रह की कविताओं में गंभीर अभिव्यक्ति और प्रभावोत्पादक भाषा -शैली के साथ चित्रण किया गया है।
दलित कवि समाज में स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना करने के लिए संघर्षरत है। वह ऐसी जगह रहना चाहते हैं -‘ मुझे रहना है सिर्फ वहाँ / मानवता के सच्चे वाहक रहते हैं जहाँ / मां-बहन और बेटियां को मिले सम्मान /वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना हो जहाँ। ‘
इस संग्रह की कविताओं में दलित समाज को अपने पुश्तैनी व्यवसाय को तिलांजलि देना, शिक्षा के लिए संघर्ष तथा सामाजिक क्रांति-चेतना से प्रभावशाली समाज की स्थापना करना है – ‘ संघर्ष करके बन जाओ सत्ताधीश /……../ संविधान को पढ़कर तुम /कानून के रखवाले बनो / खूब पढो और आगे बढो / निरंतर करते रहो विकास / भीम के सपनों का नया समाज बनाओ। ‘
इस संग्रह की कविताओं में आपसी समस्याओं के साथ यूक्रेन और रशिया के महा विनाशक युद्ध को रोकने के लिए विश्व के बुद्धिजीवीओं को शांतिदूत बनकर समाधान ढूँढने का कवि का आग्रह हैं।
इस संग्रह की कविताओं वैचारिक और उद्देश्यपरक रही है। दलित समाज के सामने क्या संकट हैं ? कैसे बचा जा सकता है ? वे ऐसे क्यों हैं ? जैसे ज्वलंत सवालों का समाधान है । संग्रह की कविताओं में सच को सीधे-सीधे कह देना तथा प्रवाहमयी काव्याभिव्यक्ति इन कविताओं को और अधिक विशिष्ट बनाती है।
सुनो दलित (काव्य-संग्रह) -डॉ.खन्नाप्रसाद अमीन
प्रकाशन- श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली-110053
प्रथम संस्करण-2023
पृष्ठ-120
मूल्य-350 ( HB)
रिपोर्ट- राजेश कुमार बौद्ध
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।

