मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा ✍️✍
”षड्यंत्र” एक ऐसा विनाशकारी शब्द है जिसके पीछे गोपनीयता, चालाकी और गहरी योजनाएं छिपी होती हैं। षड्यंत्र कभी ढ़ोल-नगाड़े बजाकर नहीं किए जाते, ये हमेशा अंधेरे में, बंद कमरों में और बेहद खामोशी से रचे जाते हैं। यही कारण है कि जब कोई षड्यंत्र आकार ले रहा होता है तो वह किसी को दिखाई नहीं देता, लेकिन जब वह पूरी तरह सफल या विफल हो जाता है, तब उसके विनाशकारी परिणाम पूरी दुनिया के सामने आते हैं। षड्यंत्र की प्रकृति ही ‘अदृश्य’ रहने की है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक, चाहे वे राजनीतिक तख्तापलट हों, व्यापारिक धोखे हों, पारिवारिक कलह हो या आरक्षण संबंधी मामले हों, षड्यंत्रकारी हमेशा अपने चेहरों पर भलाई का मुखौटा ओढ़े रहते हैं। उदाहरण के तौर पर सरकार द्वारा शोषित वर्ग की भर्तियों में भेदभावपूर्ण नीति अपनाने और आरक्षण को कमजोर करने के लिए भी अदृश्य षड्यंत्र रचे जाते हैं। सीधे तौर पर विरोध करने के बजाय, नीतियों में चालाकी से ऐसे बदलाव किए जाते हैं जिससे वंचित वर्गों के अधिकार अप्रभावी हो जाएं। यह सामाजिक समरसता को बिगाड़ने का एक गहरा प्रयास होता है। भले ही षड्यंत्र अदृश्य हो, लेकिन उसका परिणाम इतना भारी और मुखर होता है कि उसे अनदेखा करना असंभव होता है। ”षड्यंत्र उस दीमक की तरह है, जो पेड़ को अंदर ही अंदर खोखला करता रहता है। बाहर से पेड़ हरा-भरा दिखता है, लेकिन जब वह अचानक गिरता है, तब दुनिया को उसकी खोखली सच्चाई का पता चलता है।” षड्यंत्र की उम्र केवल उसके परिणाम आने तक ही होती है। परिणाम आते ही साजिश का चेहरा बेनकाब हो जाता है। इसलिए, एक सजग समाज और व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह केवल सतह पर दिखने वाली चीजों पर भरोसा ना करे। हमें घटनाओं के पीछे छिपे हुए संकेतों को समझने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए ताकि किसी भी अप्रिय परिणाम के आने से पहले ही सचेत हुआ जा सके। आखिरकार, धुएं को देखकर ही छिपी हुई आग का अंदाजा लगाया जा सकता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

