स्वदेश कुमार
अपर महासचिव
अम्बेडकर ट्रस्ट आफ इण्डिया, लखनऊ
मो0-9005846766
हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगोगे। एक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेगे। जो खून बहा, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए। हर कतरे का, हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेगे। – फैज अहमद फैज। शक्ति के विविध आयामों, जैसे योग्यता, बल, पराक्रम, सामर्थ्य व ऊर्जा की बन्दना सभ्यता के आदिकाल से होती चली आ रही है। विश्व की सम्पूर्ण मायथोलोजी के प्रतीक ईश्वर, अल्लाह, यीशू मसीह, देवी-देवताओं के तानों-बानों से ही बुनी गयी है। अमेरिका की दादागीरी सम्पूर्ण संसार में चल रही है। क्योंकि उसके पास सबसे अधिक सामरिक शक्ति एवं धन सम्पदा है। गीता उसकी सुनी जाती है, जिसके हाथ में सुदर्शन चक्र हो। राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है कि क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसे क्या जो दन्त हीन, विष हीन, विनीत सरल हो। राजनीति में वर्ण चलता है, जाति नही। जो लोग वर्ण आधारित राजनीति करते हैं, आज वही सफल है। जाति के आधार पर बिलकुल असफल है। जाति के आधार पर राजनीति करने वाले आजकल सिर्फ सत्ता दल के गुलाम बनकर अपने परिवार का ही भला मुश्किल से कर पाते है, समाज का नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ की जनगणना के अनुसार भारत ने चीन को पछाड़कर दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाले देश का खिताब हासिल कर लिया है। 31 मार्च सन 2023 के आधार पर भारत की कुल जन संख्या एक सौ ब्यालिस करोड़ छियासी लाख है। तथागत बुद्ध की जातक कथाओं में एक कथा उत्पाती सांप बुद्धानुयायी बनकर, उसने लोगों को काटना-डसना छोड़ दिया, तो लोग उसे ईंट-पत्थर से मारने लगे। इस पर उसने कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं की। ऐसे लहूलुहान घायल अहिंसक अनुयायी से बुद्ध जब फिर मिले, तो वह द्रवित हो गए एवं कहा कि मैंने काटने के लिये मना किया था मित्र, फुफकारने से नहीं। तुम्हारी फुफकार से ही लोग भाग जाते। बीरांगना फूलन देवी पिछड़ी जाति मल्लाह में पैदा, जिसने क्षत्रिय जाति के लोगों का अत्याचार बलात्कार का दर्द सहा, हथियार उठाए एवं बेहमई गाँव के बलात्कारी बीस ठाकरों को अपनी बन्दूक से एक लाइन में खड़ा करके मौत दी। यदि ब्राम्हणवाद का मुकाबला करना है, तो शूद्रों को अपनी जाति की उच्चता के घमन्ड की संर्कीण मानसिकता को त्यागकर, सिर्फ शूद्र वर्ण की ही बात देर सबेर करनी पड़ेगी। इसके अलावा भारतीय राजनीति में कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आता। अगर पिछड़ी जातियों सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से सशक्त होती तो निश्चित रूप से द्विज जातियों के सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती देती। इसलिये आर0एस0एस0 ने धर्म और आस्था के आधार पर शूद्रों, पिछड़ी जाति को जोड़ने एवं इनकी ताकत मुस्लमानों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिये बजरंग दल बनाया, जिसकी कमान विनय कटियार को दी। जैसे-जैसे राम मन्दिर आन्दोलन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे बजरंग दल का विस्तार हो रहा था। विश्व हिन्दू परिषद की कारसेवा मुहिम में बजरंग दल अग्रिम मोर्चे पर था। पिछड़ी एवं दलित जाति के बल पर बाबरी मस्जिद का विध्वंस करवाया। कारसेवा के लिये भूख प्यास एवं पुलिस की लाठियों के शिकार ज्यादा बजरंग दल वाले हुए थे। राजनीतिक लाभ कई प्रदेशों में बीजेपी सरकारें एवं केन्द्र में इसी पार्टी ने सत्ता उपभोग किया एवं कर रहे है। जैसे-जैसे भाजपा सत्ता में पहुंचती गयी, बजरंग दल का नेतृत्व भी द्विज जातियों के हाथों में पहुंचता गया। पिछड़ी जाति से आने वाले नौजवान हुड़दंग मचाने एवं हिंसा करने में इस्तेमाल होते है, लेकिन सत्ता की मलाई मनुवादी खाते है। बजरंगी सरेआम हाथों में डन्डा, लाठी, तलवारे लहराते हुए नागरिकों को पीटते है। 14 फरवरी वेंलनटाइन डे पर पार्कों एवं कालिज परिसरों में लड़के, लड़कियों को पीटते, गाली गलौज करते है। जबरन लड़कियों से लड़को को राखी बंधवाते है। इनके आगे पुलिस भी लाचार नजर आती है। संघी सरकार ने जय श्री राम का नारा इन्हीं के द्वारा बुलन्द करवाया। भारतीय राजनीति की यह विडम्बना रही है कि सामाजिक न्याय एवं राजनीतिक समावेशी राष्ट्रीयता की लड़ाई लड़ने वाले ताकतों के बीच पहले अंग्रेजो ने फूट डालो, अब हिन्दुत्ववादी ताकते डालकर सत्ता भोग रही है। डा0 आम्बेडकर एवं डा0 लोहिया के भीतर भारतीय जाति व्यवस्था के विरूद्ध आक्रोश की ज्वाला भभक रही थी। वे उसे भस्म करके दलित, पिछड़ो, किसान एवं मजदूरों के लिये बराबरी पर आधारित समाज बनाना चाहते थे। डा0 लोहिया ने इसे समाजवाद का नाम दिया था, डा0 आम्बेडकर इसे गणतन्त्र कहते थे। सन् 1925 में आर0एस0एस0 के गठन के बाद अंग्रेजो से सहयोग की नीति अपनायी। कभी आजादी की मांग का दिखावा तक नहीं किया। आज हिन्दू राष्ट्र बनाने के नाम पर बन्दे मातरम् की बात कर रहे है। गोलवरकर, और तिलक ने कहा था कि अगर पिछड़ों एवं दलितों को सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार दिए जाते है तो हमें स्वतंत्रता नहीं चाहिए। फूट डालो एवं शासन करो वाली नीति अपनाने वाले गोरे चले गए, काली चमड़ी वाले वही फन्डा अपनाकर शासन कर रहे है। एक पीढ़ी का शोषण, अत्याचार दूसरी-तीसरी एवं आगे आने वाली पीढ़ी के लिये श्रद्धा, परम्परा बन जाती है। इसलिये अपनी तर्क संगत बुद्धि एवं पैनी नजरों से ऐसे सभी तरह के मनुवादियों द्वारा रचे गए पाखण्ड, अन्धविश्वास, श्रद्धा के रूप में तेरहवी, दसवां, मृत्युभोज, पिन्डदान अन्य परम्पराओं को लात मारने में ही शूद्रों की भलाई है। सन्त कबीर ने कहा था, पाथर पूजे हरि मिले तो पूजू पहाड़। घर की चक्की कोई न पूजे जाको पीस खाए संसार।
साठ सत्तर साल पहले ग्रामीण अंचल में चोर बड़े शातिर एवं चालाक होते थे, जब वे भैंस चुराते, तो सबसे पहले एक भैंस के गले से घन्टा खोल लेते थे, फिर बाकी चोर भैंस को खोलकर पूर्व की दिशा में ले जाते थे। घन्टे वाला चोर पश्चिम दिशा में घन्टे को बजाता हुआ चलता था। घन्टे की आवाज सुनकर भैंस के घर, गाँव वाले पश्चिम दिशा में ढूंढने निकलते तो घन्टा गाँव बाहर रास्ते में पड़ा मिलता। भैंस लेकर जाने वाले चोर इस तरह अपने मकसद में कामयाब होते थे। आज यही कार्य संघी सरकार कर रही है। आम जनता को पांच किलो गेहूं, हिन्दू मुस्लिम, श्मशान, कब्रिस्तान, लेव जेहाद, तीन तलाक, राम मन्दिर, ज्ञान व्यापी मस्जिद, एन0सी0ई0आर0टी0 सलेवश से मुगलों का इतिहास निकालना, चार्ल्स डारबिन इत्यादि नये-नये महत्वहीन मुद्दों में फैलाए रख रही है। जिससे सामरिक ज्वलन्त समस्याओं जैसे रोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, विकास, गरीबी जातिवाद, जनगणना इत्यादि पर कभी चर्चा नहीं करती है। देश के सार्वजनिक संस्थान रेल, हवाई जहाज, बीमा, बैंक, डिफेन्स इत्यादि को कोढ़ियो के भाव चन्द पूंजीपतियों अडानी अम्बानी को बेंच रही है। एक मुद्दा पर बहस समाप्त नहीं होती, चार नये मुद्दे अपने पिटारे से निकालकर फैलाती है। हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के जिस राजनीतिक खेल को भाजपा पहले राम मन्दिर के सहारे, फिर कश्मीर फाइल्स के नाम पर खेलती रही अब दी केरल स्टोरी लव जेहाद के नाम पर खेला जा रहा है। जिसमें बत्तीस हजार हिन्दू-ईसाई महिलाओं को केरल से गायब कर उनका जबरिया एवं अन्य उपायों से धर्म परिवर्तन कराने के बाद उन्हें इस्लामिक स्टेट आफ इराक एवं सीरिया में भेजा गया। एन0सी0आर0 के आकड़ों के अनुसार सन् 2016 से 2022 तक गुजरात की चालीस हजार महिलाएं लापता हुई। इस संदर्भ में कोई पहल नहीं की गयी। डी0आर0डी0ओ0 का सबसे बड़ा वैज्ञानिक चितपावन ब्राम्हण प्रदीप कुरूलकर पाकिस्तान को खुफिया जानकारी देता पकड़ा गया। अब उसके घर पर बुल्डोजर नहीं चलेगा। न कोई उसकी जाति, धर्म पूछेगा। क्योंकि ये संघी है। अगर दलित, पिछड़ी या मुस्लिम जाति का होता तो उसका परिवार का सर्वनाश कर दिया होता। जातिवाद या अन्य भेदभाव को लेकर सवर्ण बौद्धिक तबके का दोहरा रवैया अब किसी दार्शनिक आवरण से छिपाए नहीं छिपा रहा है। वे कह रहे है कि जातिवाद जनगणना से जाति खत्म नहीं होगी, लेकिन जाति खत्म करने का कौन सा एजेन्डा उनके पास है? या उन्होंने इस मकसद से व्यक्तिगत या संगठित प्रयास के रूप को चिन्हित किया है, वे बताने को तैयार नहीं है। डाटा के इस युग में अगर जातिवार जनगणना सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में विभिन्न जातियों के हाशिए या वर्चस्वशाली, स्थिति में होने का कोई प्रमाणिक खाका रखती है। किसी बीमार मनुष्य का क्लीनीकल टेस्ट रोकना, तो उसे मारने की साजिश होती है। बहुजन दलित एवं पिछड़ी जाति का समाज आन्तरिक रूप से क्षयग्रस्त रहे तो बना रहे, लेकिन जातिवार जनगणना पर बात न हो, ये कैसी जिद है? या फिर हर क्षेत्र में कुछ सवर्ण जातियों के अतिरे की रूप से काबिज होने की बात खुल जाने का डर है। संघी सरकार सामाजिक न्याय के एजेन्डे को जहर का गहरा प्याला समझती है। सामाजिक न्याय के अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में आने से बौखला रहे बुद्धिजीवी सवर्ण समाज से ही आते है जिनके पास हजारों साल की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक पूंजी है। वे वंचित तबको को उनकी हिस्सेदारी देने की बात आते ही बिलबिला क्यों उठते है? उन्हें बीते जमाने की चीज तभी क्यों लगती है जब आरक्षण, जातिवार जनगणना रोजगार सृजन की बात होती है, वरना अपने इर्दगिर्द जाति के आधार पर अवसरों की जारी खुली लूट पर उनका गुस्सा कभी नहीं फूटता। जितनी आबादी उतना हक की बात करे, तो भारत सरकार में 7 प्रतिशत सचिव स्तर के अधिकारी दलित, आदिवासी पिछड़े वर्ग के है। विश्वविद्यालयों में वंचित तबको से आने वाले कुलपति ढूढे नहीं मिलते। अमेरिका एक समावेशी समाज बन रहा है। अन्तर धार्मिक एवं अन्तरनस्ली विवाह सामान्य होते जा रहे है। हॉलीवुड के बहुत से हीरो-हिरोइन, उस अश्वेत समाज से आते है जो गुलाम से अधिक हैसियत नहीं रखते थे। वालीवुड के रूपहले पर ही सही, क्या हम किसी ऐसे हीरो को देख पाते है, जिसके सरनेम से उसके दलित होने का पता चलता है? संविधान में जातीय आधार पर प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान है, इसलिये समाज के उपेक्षित, उत्पीड़ित गरीब एवं पिछड़े वर्ग को भी आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। जब तक जमीन समतल नहीं होगी, उसके सभी कोनों में आसानी से पानी नहीं जा सकता। गर्व से कहो हम सब शूद्र है, हिन्दू नहीं, हम सबके वंशज नायक महापुरूष मूलनिवासी हमारे पुरखे है। काल्पनिक ईश्वर देवता देवी नहीं। आज सवर्ण शासन कर रहे है, तो केवल पिछड़ी एवं दलित जातियों के कन्धो पर, जिस दिन पचासी प्रतिशत जनता सवर्णों की गुलामी करना बन्द कर देगा, उस दिन भारत में शासन मूलनिवासियों का होगा। बाबा साहेब आम्बेडकर ने मनु के संविधान को जलाकर, इस देश को समता, समानता एवं बन्धुत्व की विचारधारा देकर, ब्राम्हणवाद के विपरीत भारतीय संविधान दिया। वेद, पुराण, गीता, महाभारत, रामायण आदि काल्पनिक कथाओं को नकारते हुए, हमें सकारात्मक, बौद्धिक, तार्किक एवं विज्ञान शोधित विचाराधारा दी। मनुवाद इतना कमजोर नहीं कि कोई अलादीन के चिराग से भस्म कर दे। सभी मिलकर लड़ेंगे तो अवश्य कामयाब होंगे जैसे राजेन्द्र यादव ने कहा कि सेनानी करो प्रयाण अभय भावी इतिहास तुम्हारा है। ये नखत अमा के बुझते है, सारा आकाश हमारा है। बहुजन चिन्तक बुद्ध शरण हंस के मुताबिक ओबीसी के नेताओं की चुप्पी का ही कुफल है कि आज ब्राम्हणवाद का सबसे बड़ा पैरोकार पिछड़ा वर्ग बना हुआ है। अगर पिछड़े वर्ग ने डा0 आम्बेडकर का साथ दिया होता तो 85 प्रतिशत जनता का वर्तमान श्रेष्ठ होता। गाँव-गाँव में जब तक फूले, आम्बेडकर, ललई सिंह यादव, जगदेव प्रसाद, शाहू जी महराज इत्यादि महानायकों की चर्चा नहीं होगी, तब तक ओबीसी से कैसे उम्मीद कर सकते हो, वह सत्यनारायण कथा एवं ब्राम्हणवाद के बाढे़ से बाहर निकलेगा। आज पिछड़े एवं बहुजन समाज की सोच संकुचित होती जा रही है, केवल अपना स्वार्थ देखते है, अन्य के दुख दर्द की कोई चिन्ता नहीं जैसे कि कसाई जिस मुर्गे को काटने के लिये पिंजरे से बाहर निकालता है, वही चीखता है। बाकी पिंजरे के मुर्गे दाना खाने में जुटे रहते है। भारतीय संविधान हमारी धार्मिक पुस्तक है और ज्ञान के प्रतीक बाबा साहेब आम्बेडकर धर्म गुरू है। नेपोलिश कवि चेस्लाव ने कहा कि ऐसा भी वक्त आता है, जब चारों तरफ सच के अल्फाज की बौछार ही रही हो, तो भी समाज को कोई आवाज सुनाई न ही देती। उस वक्त उस सच से कोई जागता नहीं, कोई घायल भी नहीं होता। कोरोना महामारी के वक्त लाखों मजदूर सड़कों पर थे। उनके लिये राहत की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल की गयी। सरकार ने अदालत को कहा कि अभी कोई सड़क पर नहीं है। अदालत ने कहा कि सरकार ही सच बता सकती है। सरकार की बात मानते हुए कोर्ट ने भी फाइल बन्द कर दी। उस समय भारत की सड़कों पर मजदूर पैदल, साईकिल पर हजारों मील दूर अपने ठिकाने के लिये कड़ी धूप में भूखे प्यासे अपना रास्ता नाप रहे थे, सैकड़ों बच्चे, पुरूष, स्त्रीयां रास्ते में मर गये। सच आँखों के सामने था, अदालत को उसमें दिलचस्पी नहीं, सरकार की खामोशी। सन् 2019 के आम-चुनाव में भाजपा ने पुलवामा हमला को चुनावी मुद्दा बनाया एवं जीत हासिल की। उस समय विपक्ष एवं बुद्धिजीवियो के सच जानने की मांग को देशद्रोही ठहराया गया। तानाशाही एवं जनतंत्र का यही फर्क है कि तानाशाही सच का एक मात्र स्रोत सत्ता को बतलाती है। स्टालिन के सच पर सवाल करने वालों का क्या हश्र हुआ। माओं से लेकर जीनपिन तक के चीन में सच की खोज का जोखिम क्या है? किसी से छिपा नहीं, गोयवेल्स ने तो सच की परिभाषा ही बदल दी थी। मोदी सरकार के सच का पर्दाफाश उनके शासक न रहने पर होगा या नहीं समय बतलाएगा। महाभारत के धृतराष्ट्र के कूटनीतिक मंत्री कणिक ने उन्हें समझाया था कि जिनके राज्य छीने जाने का कोई भी संकट हो, उन्हें निश्चित रूप से शत्रु समझा जाए एवं ऐसे लोगों को कभी भी जीवित नहीं छोड़ा जाए। चतुर राजा वही है, जो देने की बात का ढोंग तो करे, लेकिन दे नहीं। जितना सम्भव हो, टालता रहे। कणिक की मन्त्रणा थी, पाण्डवों को राज्य देने की बात तो की जाए किन्तु उन्हें दिया न जाए, जितनी जल्दी हो, पाण्डवों का वध कर दे। वर्तमान में संघी सरकार यही कुकर्म दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों के साथ कर रही है। पुलवामा में जवानों की शहादत को वोट बैंक में तब्दील करना संघी सरकार से सीखा जा सकता है। कांग्रेस की बैचारिक असहमति रखने वालों को भारत के राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में भागीदार बनाया। बाबा साहेब आम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया एवं श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जम्मू एवं कश्मीर के मामले में मंत्री, यह बहुदलीय व्यवस्था वाली संसदीय प्रणाली का नतीजा था। सरकार एवं विपक्ष का सम्मान का महत्व था अब तो विपक्ष देशद्रोही जो संघी सरकार की आलोचना करें। दलित और ओबीसी इस बात को नहीं समझ रहे दक्षिणपन्थी ताकतों को समस्या 85ः समाज से है, जो सदियों से वंचित रहे समुदायों के ऊपर उठने से घबराते है। उन्हें रोकने के लिये वे उनके सामने मुसलमान को खड़ा कर देते है। अंग्रेज गोरों से भी ज्यादा ये काले भारतीय अंग्रेज अधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं। जाति धर्म के नाम पर जनता को जनता से, पिछड़े को दलितों से लड़ाना, महँगाई बेरोजगारी, भ्रष्टाचार बढ़ाकर जनता को लूटना अश्लील साहित्य, गन्दी फिल्मों आदि के माध्यम से नौजवानों को गुमराह कर रहे है। मान्यवार कांशीराम ने कहा था कि हमें डर नहीं कि वो कितने ताकवर है, अफसोस ये है कि हम जिनके लिये लड़ रहे है वह हमारे लोग वही उसकी ढाल बने है, वरना ये जंग तो हम सदियों पहले जीत लिये होते।
दिनांक-05.06.2023

