मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत”, यह सदियों पुरानी कहावत आज के आधुनिक युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। नकारात्मक और बिगड़ी हुई सोच किसी भी इंसान का सबसे बड़ा मानसिक रोग है। यह एक ऐसा अदृश्य शत्रु है, जो बाहर से भले ही दिखाई ना दे, लेकिन इंसान को अंदर ही अंदर पूरी तरह खोखला कर देता है। जब एक व्यक्ति लगातार नकारात्मक विचारों के घेरे में रहता है, तो उसका दृष्टिकोण बिगड़ जाता है। वह हर परिस्थिति में केवल कमियां, असफलता और निराशा ही ढूंढता है। यह सोच धीरे-धीरे एक मानसिक बीमारी का रूप ले लेती है, जिसके गंभीर परिणाम होते हैं ।
बिगड़ी हुई सोच के कारण व्यक्ति दूसरों के प्रति भी शंकालु और कटु हो जाता है, जिससे उसके सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते टूटने के कगार पर आ जाते हैं। इस मानसिक रोग का इलाज किसी मेडिकल स्टोर पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के अपने नजरिए में छिपा है। जब भी कोई नकारात्मक विचार आए, उसे तुरंत रोकें और उसका तार्किक मूल्यांकन करें क्योंकि नकारात्मक सोच एक ऐसा जहर है जिसे इंसान खुद अपनी इच्छा से पीता है। परिस्थितियां कभी भी इतनी खराब नहीं होतीं जितना हमारी बिगड़ी हुई सोच उन्हें बना देती है। यदि जीवन को भरपूर और जीवंत तरीके से जीना है, तो इस मानसिक दीमक को अपने दिमाग से निकाल फेंकना होगा। याद रखिए, आपकी सोच ही आपके भविष्य का निर्माण करती है । इसलिए इसे संवारें और बिगड़ने ना दें।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

