पिछले सौ वर्षों में दलित समाज ने अनेक नेताओं को जन्म दिया, लेकिन अधिकांश संयुक्त मताधिकार के जाल में फँसकर सत्ता के सौदेबाज़ बन गए। वे वंचितों के हितों को भूलकर सवर्ण वोटबैंक के भिखारी हो गए, जो आज़ाद भारत के ‘लिखित गुलाम’ साबित हुए। डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा माँगी गई पृथक निर्वाचन और पृथक धर्म जनगणना की माँग को सभी वंचित वर्ग दलित, आदिवासी, पिछड़े को पुनः जोरदार तरीके से उठाना चाहिए।
1920-30 के दशक में अंबेडकर ने ब्रिटिश कम्युनल अवॉर्ड (1932) के तहत पृथक निर्वाचन की माँग की, ताकि दलित अपनी सीटें स्वयं चुन सकें। यह अधिकार प्राप्त भी हुआ महात्मा गांधी ने हकताक्षर भी किए परंतु महात्मा गांधी के अनशन के दबाव में पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932) हुआ, जिसमें पृथक निर्वाचन त्यागकर संयुक्त निर्वाचन स्वीकार करना पड़ा, हालाँकि आरक्षित सीटें 71 से बढ़कर 148 हो गईं। अंबेडकर ने अपनी पुस्तक What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables (1945) में इसे दलितों की राजनीतिक गुलामी बताया।
स्वतंत्र भारत के संविधान (अनुच्छेद 330-342) ने भी यही संयुक्त प्रणाली अपनाई।
संयुक्त मताधिकार ने दलित नेताओं को मुख्य दलों का चमचा बना दिया। जगजीवन राम 1970 के दशक में इंदिरा सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने, लेकिन 1977 में चरण सिंह से सत्ता-सौदा किया और दलित मुद्दों पर चुप्पी साधी।
मायावती ने 2007 में ब्राह्मण वोट जोड़कर यूपी की सीएम बनी, भाजपा से गठबंधन कर दलित एजेंडा दफ़ना दिया ।
2019 में बसपा को सिर्फ 19 लोकसभा सीटें मिलीं। रामविलास पासवान 1990-2020 तक NDA, RJD, BJP के साथ उछले, परिवारवाद को बढ़ावा दिया। 1952 से 2024 तक अधिकांश दलित विधायक/सांसद सवर्ण-प्रधान दलों से ही जीते , उनका आपके दर्द से कोई सरोकार नहीं रहा ।
दलित उम्मीदवार को सवर्ण वोट चाहिए, इसलिए समाज हित त्यागकर सामान्य एजेंडा अपनाते हैं , पूना पैक्ट का ‘दोहरा वोट’ धोखा साबित हुआ। NSSO 2023-24 डेटा दिखाता है कि SC परिवारों का औसत मासिक खर्च ₹3,878 (ग्रामीण) है, भूमिहीनता 71% बनी हुई।
2011 जनगणना में दलित बौद्ध ‘अन्य’ में घुसे, वास्तविक संख्या (25 करोड़+) छिपी आद धर्म/सरना धर्म की तरह पृथक कोड की माँग सही है।
पृथक निर्वाचन से दलित 100% वोट से सच्चे नेता चुन सकेंगे। पाकिस्तान में अहमदिया को गैर-मुस्लिम कोटा मिला, जो उनकी आवाज़ मज़बूत करता। भारत में संविधान संशोधन से संभव; केरल ईसाई आरक्षण मॉडल उदाहरण है।
पृथक जनगणना से सटीक कोटा मिलेगा। वंचित एकता से संसद में दबाव बनाओ , मार्च, याचिकाएँ।
अंबेडकर का सपना पूरा करो।
गुलाम अछूत नेताओं को उनकी वास्तविकता बताओ ।
पृथक निर्वाचन अधिकार और पृथक पहचान के लिए आंदोलन को तेज करो जाति पंथ मत भेद को सामंती हवन में स्वाह कर दो ।
जय आदवंशी , जय आद धर्म
लेखक:William Paul Aadvanshi
National convener
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