Sunday, April 19, 2026
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धर्म मनुष्य का व्यक्तिगत विषय है, लेकिन जब बात सार्वजनिक व्यवस्था और अधिकार की आती है, तो संविधान ही होता है एकमात्र मार्गदर्शक

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जब एक विविध समाज में ‘व्यक्तिगत विश्वास’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के बीच टकराव होता है, तो वहां संविधान ही वह एकमात्र मार्गदर्शक बन जाता है, जो न्याय और समानता सुनिश्चित करता है। ​समस्या तब उत्पन्न होती है, जब धार्मिक कुप्रथाएं सार्वजनिक जीवन, कानून या अन्य लोगों के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने लगती हैं। इतिहास साक्षी है कि धर्म के नाम पर कई बार ऐसी कुप्रथाएं प्रचलित रहीं, जो आधुनिक न्याय की दृष्टि में दोषपूर्ण थीं। उदाहरण के लिए धर्म की आड़ में छुआछूत या ऊंच-नीच को बढ़ावा देना,​लैंगिक असमानता, सती प्रथा, बाल-विवाह, जातिगत शोषण आदि अनेक कुप्रथाएं शामिल हैं । ​मार्गदर्शक के रूप में संविधान की भूमिका ​जहां धर्म ‘श्रद्धा’ पर आधारित है, वहीं संविधान ‘तर्क और न्याय’ पर आधारित है। एक आधुनिक लोकतंत्र में संविधान सर्वोच्च होता है क्योंकि यह किसी विशेष धर्म का पक्ष लेने के बजाय सभी को समान धरातल पर रखता है।
​ धर्म हमें एक ‘अच्छा इंसान’ बनाना सिखा सकता है, लेकिन संविधान हमें एक ‘सभ्य नागरिक’ के रूप में अधिकारों की सुरक्षा प्रदान करता है। धर्म घर की चारदीवारी और अंतःकरण तक सीमित रहने पर ही अपनी पवित्रता बनाए रखता है। जैसे ही हम सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखते हैं, हमारी पहचान केवल एक श्रद्धालु की नहीं, बल्कि एक नागरिक की होती है ।​अंततः, एक प्रगतिशील समाज वही है, जहां धर्म व्यक्तिगत प्रेरणा का स्रोत हो और संविधान सामाजिक न्याय का अंतिम निर्णयकर्ता। जब तक संविधान की सर्वोच्चता बनी रहेगी, तब तक हर व्यक्ति का अधिकार सुरक्षित रहेगा—चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला हो या किसी को भी ना मानने वाला।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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