मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला होती है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था, “शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह दहाड़ेगा” लेकिन वर्तमान दौर में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण ने इस ‘शेरनी के दूध’ को एक महंगी विलासिता की वस्तु बना दिया है। जब शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान का प्रसार ना होकर केवल ‘मुनाफा कमाना’ हो जाता है, तो इसका सबसे भयावह प्रभाव समाज के शोषित, वंचित और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग पर पड़ता है । शोषित समाज, जो सदियों से सामाजिक और आर्थिक असमानता की मार झेल रहा है, उसके लिए सरकारी स्कूल और कॉलेज ही उन्नति का एकमात्र द्वार रहे हैं।
शिक्षा के निजीकरण के कारण निजी संस्थानों कीआसमान छूती फीस गरीब माता-पिता की पहुंच से बाहर है। एक श्रमिक या दलित-पिछड़े वर्ग का व्यक्ति अपने बच्चों को उन ‘कॉर्पोरेट स्कूलों’ में भेजने की सोच भी नहीं सकता, जहां शिक्षा से ज्यादा चमक-धमक और विज्ञापनों पर खर्च किया जाता है। संविधान हमें ‘समानता का अधिकार’ देता है, लेकिन निजीकरण एक ऐसी दीवार खड़ी कर रहा है, जहां अमीर का बच्चा ‘डिजिटल क्लासरूम’ में पढ़ता है और गरीब का बच्चा बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता है। सरकारी संस्थानों में संवैधानिक रूप से मिलने वाला आरक्षण शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाता है। निजी संस्थानों में आरक्षण की कोई स्पष्ट नीति ना होने के कारण ये वर्ग उच्च शिक्षा और बेहतर नौकरियों की दौड़ से बाहर होते जा रहे हैं।
शिक्षा का निजीकरण केवल एक आर्थिक नीति नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित तरीके से एक बड़े वर्ग को ज्ञान से वंचित रखने की साजिश प्रतीत होती है। यदि शोषित समाज का बच्चा शिक्षित नहीं होगा, तो वह अपने अधिकारों के लिए आवाज कैसे उठाएगा? गांवों और झोपड़ियों में छिपी हुई अनगिनत प्रतिभाएं केवल इसलिए दम तोड़ देती हैं क्योंकि उनके पास निजी कोचिंग और भारी-भरकम कॉलेज की फीस के पैसे नहीं होते। जब शिक्षा महंगी होती है, तो बच्चे पढ़ाई छोड़कर बाल श्रम की ओर धकेले जाते हैं। इससे शोषित समाज गरीबी और गुलामी के उसी पुराने चक्र में फंसा रह जाता है । निजीकरण शिक्षा को ‘कौशल’ तक सीमित कर देता है, जिससे केवल ‘नौकर’ पैदा होते हैं, ‘विचारक’ नहीं। यह शोषित समाज को नेतृत्व करने की क्षमता से दूर रखता है ।शिक्षा का निजीकरण वास्तव में सामाजिक न्याय की हत्या है। यदि हमें एक सशक्त समाज व राष्ट्र का निर्माण करना है, तो सरकार को शिक्षा की जिम्मेदारी से हाथ नहीं खींचना चाहिए। शिक्षा कोई ‘बाजारू वस्तु’ नहीं है जिसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेच दिया जाए। ”जिस देश में शिक्षा बिकने लगती है, उस देश का लोकतंत्र खोखला होने लगता है।”
अतः, यह अनिवार्य है कि शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक लगाई जाए और सरकारी स्कूलों व विश्वविद्यालयों के स्तर को इतना ऊंचा उठाया जाए कि देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का बच्चा भी डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनने का सपना देख सके। शोषित समाज के बच्चों को शिक्षा से वंचित करना केवल उनकी बर्बादी नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रगति के साथ खिलवाड़ है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

