लेखक: श्रवण कुमार
राजस्थान के अजमेर जिले के एक छोटे से गांव में कुछ महीने पहले एक परिवार में शोक का माहौल था। घर के बुजुर्ग दादा का निधन हो गया था। कुछ समय बाद परिवार ने समाज के लोगों को बुलाकर “न्यात” करने का फैसला किया। यह एक सामुदायिक भोज होता है जिसमें रिश्तेदार और समाज के लोग शामिल होते हैं।
न्यात की तैयारी चल रही थी। घर में लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। इसी बीच परिवार के बुजुर्गों ने एक और फैसला किया—घर की 15 साल की लड़की की शादी भी उसी मौके पर कर दी जाए।
कारण साधारण था।
“जब पूरा समाज आ ही रहा है तो शादी भी कर देंगे, अलग से खर्च क्यों करना,” परिवार के एक सदस्य ने कहा।
लड़की की उम्र 18 साल से कम थी, लेकिन गांव में यह बात किसी को असामान्य नहीं लगी।
राजस्थान के कई ग्रामीण इलाकों में, खासकर देवासी (रायका) समाज में, ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं जहां सामाजिक परंपराएं और आर्थिक कारण मिलकर कम उम्र में लड़कियों की शादी का रास्ता बना देते हैं।
न्यात: एक परंपरा, जिसमें कई फैसले साथ हो जाते हैं
देवासी समाज में जब किसी बुजुर्ग—जैसे दादा या दादी—का निधन होता है, तो कुछ समय बाद परिवार समाज के लोगों को बुलाकर सामूहिक भोज करता है। इसे स्थानीय भाषा में न्यात कहा जाता है।
इस आयोजन में पूरा समाज शामिल होता है। कई बार परिवार इसी अवसर पर दूसरे सामाजिक काम भी एक साथ करने की कोशिश करते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार ऐसे मौकों पर कम उम्र के बच्चों की शादियां भी तय कर दी जाती हैं।

गांव के निवासी मनीष बताते हैं:
“गांव में कई बार ऐसा होता है कि न्यात के समय रिश्तेदार भी आते हैं और समाज के लोग भी। तब परिवार सोचता है कि शादी का खर्च अलग से करने के बजाय उसी समय कर दिया जाए।”
लेकिन कई बार इस प्रक्रिया में लड़कियों की उम्र और उनकी पढ़ाई जैसे मुद्दे पीछे रह जाते हैं।
आटा-साटा: बेटी के बदले बेटी
देवासी समाज में एक और प्रथा देखने को मिलती है—आटा-साटा।
इस व्यवस्था में दो परिवार अपनी बेटियों का विवाह आपस में करते हैं। यदि एक परिवार का बेटा दूसरे परिवार की बेटी से शादी करता है, तो बदले में उस परिवार की बेटी की शादी पहले परिवार में कर दी जाती है।
ग्रामीण इलाकों में इसे अक्सर “बेटी के बदले बेटी” कहा जाता है।
परिवारों का कहना है कि इससे दहेज का दबाव कम हो जाता है और दोनों परिवारों के बीच संतुलन बना रहता है।
लेकिन कई बार इस व्यवस्था में लड़कियों की उम्र और उनकी इच्छा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।
एक अधूरी कहानी: आशीष देवासी की पीड़ा
जोधपुर जिले के बिलाड़ा क्षेत्र के एक छोटे से गांव के रहने वाले आशीष देवासी की कहानी इस प्रथा के असर को करीब से दिखाती है।
आशीष बताते हैं कि उनकी सगाई उन्हें याद भी नहीं है।
“मेरी सगाई बचपन में ही कर दी गई थी। मुझे तो यह भी याद नहीं कि मेरी सगाई कब हुई,” वे कहते हैं।
उनकी बहन की सगाई भी उसी समय आटा-साटा प्रथा के तहत की गई थी। यानी जिस परिवार में उनकी बहन की शादी तय हुई थी, उसी परिवार की लड़की से आशीष की शादी भी तय कर दी गई।
कुछ साल बाद आशीष की शादी हो गई, लेकिन उनकी बहन की शादी बाकी थी।
फिर अचानक एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।
जिस युवक से उनकी बहन की शादी होनी थी, वह मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर बैठा।
आशीष बताते हैं:
“मेरी पत्नी आने वाली थी, लेकिन आटा-साटा के कारण उन्होंने उसे रोक दिया। इसके बाद हमारी शादी टूट गई।”
अपनी कहानी बताते हुए उनकी आवाज धीमी हो जाती है।
“कैसे भी करके यह प्रथा बंद होनी चाहिए। सरकार को इस पर ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि मेरे जैसे लोगों की जिंदगी बर्बाद होने से बच सके,” वे कहते हैं।
लोक कविता में भी झलकती है पीड़ा
राजस्थान के ग्रामीण समाज में आटा-साटा प्रथा के सामाजिक प्रभावों को लेकर लोक कविताओं में भी दर्द दिखाई देता है। सामाजिक कार्यकर्ता और लोक कवि मुकेश खारवाल अपनी एक कविता में इस पीड़ा को इस तरह व्यक्त करते हैं:
“साफा वालो सिर नीं दिखे,
मिनख मूंछ रा काईं मरगा रै।
लोई मरगो, मुंडो रो,
ओ जमाणो कैडो रै।
आटा-साटा रा चक्कर में,
माई-बाप, भाई-बहिण रा रिश्ता मारे रै।
रिश्तां में कोढ़ उगड़ ग्यो,
महाभारत आ घर-घर चालै रै।”
यह कविता उन सामाजिक तनावों को दर्शाती है जो कई बार आटा-साटा जैसी परंपराओं के कारण परिवारों और रिश्तों में पैदा हो जाते हैं।
शोध क्या बताता है
ग्रामीण समाज में आटा-साटा या एक्सचेंज मैरिज को लेकर कई शोध किए गए हैं।
International Journal of Sociology and Social Policy में प्रकाशित अध्ययन
“Women in Exchange: Atta-satta Marriage” में इस प्रथा के सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।
रिसर्च लिंक:
https://www.emerald.com/ijssp/article/doi/10.1108/IJSSP-07-2025-0485/1346947
अध्ययन के अनुसार ऐसे विवाहों में दो परिवारों के रिश्ते आपस में जुड़े होते हैं और कई बार एक परिवार में होने वाला विवाद दूसरे परिवार की महिला के जीवन को भी प्रभावित कर सकता है।
आंकड़े क्या कहते हैं
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS-5 के अनुसार राजस्थान में 20 से 24 वर्ष की लगभग 25 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो चुकी थी।
हालांकि पिछले वर्षों में इसमें कमी आई है।
NFHS-4 के समय यह आंकड़ा लगभग 35 प्रतिशत था।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, जागरूकता और सरकारी कार्यक्रमों के कारण स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, लेकिन कुछ ग्रामीण समुदायों में सामाजिक परंपराएं अभी भी मजबूत हैं।
सामाजिक संगठनों की पहल
बाल विवाह को रोकने और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई सामाजिक संगठन गांवों में काम कर रहे हैं।
Sharshti Foundation के सामाजिक कार्यकर्ता महेश कुमार कहते हैं:

“हम देखते हैं कि परंपरा और आर्थिक दबाव के कारण कई परिवार कम उम्र में लड़कियों की शादी कर देते हैं। हमारा प्रयास है कि लड़कियों को पढ़ाई और सुरक्षित भविष्य मिले। Awareness campaigns और workshops के जरिए हम परिवारों को सही जानकारी देने की कोशिश करते हैं।”
कानून और सरकारी प्रयास
राजस्थान सरकार ने बाल विवाह को रोकने के लिए “बाल विवाह मुक्त राजस्थान अभियान” शुरू किया है।
इसके तहत गांवों में जागरूकता कार्यक्रम, स्कूल एनरोलमेंट अभियान और समुदाय स्तर पर बैठकें आयोजित की जाती हैं।
विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारी राजेंद्र जी कहते हैं:

“Bal Vivah Mukt Rajasthan Abhiyan के तहत हम communities में legal awareness फैला रहे हैं। Aata-Sata और न्यात जैसी प्रथाओं के बारे में परिवारों को समझाना जरूरी है ताकि लड़कियों को सुरक्षित और शिक्षित जीवन मिल सके।”
बदलती सोच
हाल के वर्षों में देवासी समाज के भीतर भी कुछ बदलाव दिखाई दे रहे हैं।
कई परिवार अब अपनी बेटियों को स्कूल और कॉलेज भेज रहे हैं। गांवों में पढ़ाई करने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ रही है और युवा पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर अधिक जागरूक हो रही है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से धीरे-धीरे समाज में बदलाव संभव है।
परंपरा और बदलाव के बीच
राजस्थान के ग्रामीण समाज में परंपराएं गहरी जड़ें रखती हैं। लेकिन बदलते समय के साथ कई परिवार यह समझने लगे हैं कि लड़कियों की शिक्षा और उनका भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
देवासी समाज में भी अब कई लोग यह सवाल पूछने लगे हैं कि क्या परंपरा के नाम पर कम उम्र में लड़कियों की शादी करना सही है।
बदलाव धीमा जरूर है, लेकिन यही बदलाव आने वाले समय में बाल विवाह जैसी प्रथाओं को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।
यह लेख श्रवण कुमार द्वारा लाड़ली मीडिया फैलोशिप के अंतर्गत लिखा गया है।
लाड़ली मीडिया और UNFPA द्वारा समर्थित यह फैलोशिप मीडिया में लैंगिक समानता, लड़कियों की शिक्षा और बाल विवाह जैसे मुद्दों पर संवेदनशील और जमीनी रिपोर्टिंग को बढ़ावा देती है।
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। लाड़ली मीडिया और UNFPA इन विचारों से आवश्यक रूप से सहमत हों, यह आवश्यक नहीं है।

