मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍️✍️
बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन चक्र का एक अनिवार्य और सम्मानजनक हिस्सा है। यह वह समय है, जब व्यक्ति सांसारिक भागदौड़ से हटकर स्वयं को जानने और जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने की दिशा में बढ़़ सकता है। इसलिए हमें वृद्ध होने पर पछतावा करने के बजाय इस बात के लिए आभारी होना चाहिए कि प्रकृति ने हमें इस लंबी यात्रा के योग्य समझा। हर सफेद बाल और हर ढ़़लती शाम इस बात की गवाह है कि हमने संघर्ष भरे जीवन को आनंदमय जिया है।
जैसा कि कहा गया है, “उम्र बढ़़ना अनिवार्य है, लेकिन बूढ़ा (मन से) होना ऐच्छिक है।” यदि हम इस विशेषाधिकार का सम्मान करें, तो वृद्धावस्था जीवन का सबसे शांतिपूर्ण और संतोषजनक अध्याय बन सकता है। वृद्ध होने का पछतावा करना व्यर्थ है। हमें इस अवस्था को पूरे सम्मान के साथ स्वीकार करना चाहिए। यह प्रकृति का वह चरण है, जहाँ गति कम होती है ताकि हम जीवन की गहराई को समझ सकें। याद रखें, “बूढ़ा होना एक अनिवार्य प्रक्रिया है, लेकिन उन वर्षों का आनंद लेना एक कला है।” यह वह अवसर है जो लाखों को नसीब नहीं हुआ, इसलिए इसे पछतावे में नहीं, बल्कि कृतज्ञता के साथ जीना चाहिए।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

