Tuesday, September 29, 2026
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आज का इंसान: कद और पद का भूखा समाज

बंटी गर्ग
लेखक
मूक नायक
संभाग प्रभारी

वर्तमान समय में समाज एक अजीब सी दौड़ का हिस्सा बन चुका है। यह दौड़ विकास, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की नहीं, बल्कि “कद” और “पद” की है। आज का इंसान अपने व्यक्तित्व की ऊँचाई से अधिक अपने पद की ऊँचाई को महत्व देने लगा है। सम्मान कमाने के बजाय वह सम्मान दिखाने में विश्वास करने लगा है।
समाज में व्यक्ति की पहचान अब उसके चरित्र, विचार और कर्म से कम, उसके पद और प्रभाव से अधिक होने लगी है। चाहे राजनीति हो, सामाजिक संगठन हो या फिर निजी जीवन—हर जगह पद पाने की होड़ साफ दिखाई देती है। पद मिलते ही व्यवहार बदल जाता है, भाषा बदल जाती है और कभी-कभी तो अपने लोग भी पराये लगने लगते हैं। यह प्रवृत्ति केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि संभाग और जिला स्तर तक गहराई से फैल चुकी है।
कद और पद की यह भूख समाज में असंतुलन पैदा कर रही है। लोग सेवा की भावना से नहीं, बल्कि पहचान और प्रतिष्ठा की लालसा से काम कर रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में भी अब उद्देश्य कम और प्रदर्शन अधिक दिखने लगा है। फोटो, प्रचार और मंच की राजनीति ने वास्तविक कार्य को पीछे धकेल दिया है।
विचारणीय बात यह है कि असली “कद” पद से नहीं, बल्कि व्यक्तित्व से बनता है। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने बिना किसी पद के समाज में कार्य किया, उनका सम्मान आज भी कायम है। वहीं केवल पद के बल पर आगे बढ़ने वाले लोग समय के साथ भुला दिए जाते हैं।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। हमें यह समझना होगा कि पद सेवा का माध्यम है, अधिकार का नहीं। यदि पद के साथ विनम्रता और जिम्मेदारी जुड़ जाए तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
अंततः, कद और पद की इस अंधी दौड़ में कहीं इंसानियत पीछे न छूट जाए—यह चिंता हम सबकी होनी चाहिए। जब तक व्यक्ति अपने भीतर के मूल्य नहीं जगाएगा, तब तक समाज केवल पदों का संग्रहालय बनकर रह जाएगा, व्यक्तित्वों का नहीं।

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