मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जब हम कहते हैं कि हम ‘संघर्ष’ कर रहे हैं, तो अक्सर हमारे भीतर एक बेचैनी, प्रतिरोध और अभाव की भावना होती है। ‘संघर्ष’ शब्द में एक प्रकार का तनाव छिपा है—ऐसा लगता है जैसे हम किसी ऐसी चीज से लड़़ रहे हैं, जो बहुत बलवान है और हम उसके सामने खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं। जब मन में यह भाव होता है कि परिस्थितियां हमारे विरुद्ध हैं, तो हमारी आधी ऊर्जा उस लड़ाई के डर में ही नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि केवल ‘संघर्ष’ करने वाला व्यक्ति अक्सर थक जाता है । इसके विपरीत, संघर्ष में ‘डटे रहने’ का अर्थ धैर्य, अडिग संकल्प और मानसिक स्थिरता है। डटे रहने वाला व्यक्ति लड़ता नहीं है, बल्कि वह अपनी जगह नहीं छोड़़ता। समय और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन उसका लक्ष्य स्थिर है। इसी तरह समुद्र की लहरें चट्टान से टकराकर ‘संघर्ष’ करती हैं और बिखर जाती हैं, लेकिन चट्टान अपनी जगह पर ‘डटी’ रहती है। अंततः लहरों को ही वापस मुड़़ना पड़़ता है।
इतिहास गवाह है कि महान उपलब्धियों के लिए ज्योतिबा फुले, डॉ भीमराव अंबेडकर, अब्दुल कलाम व अन्य महापुरुषों ने विकट परिस्थितियों में कड़ा संघर्ष कर अपना लक्ष्य हासिल किया और मैदान छोड़़कर नहीं भागे। जीतने के लिए केवल लड़ना ही काफी नहीं है, लड़ते रहना भी जरूरी है। परिस्थितियां आपको डराने की कोशिश करेंगी, लोग आपको कमजोर कहेंगे, लेकिन यदि आप अपनी जगह पर अंगद के पैर की तरह डटे रहे, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको हरा नहीं सकती। याद रखिए, तूफान केवल उन्हीं पेड़ों को गिरा पाता है जिनकी जड़ें गहरी नहीं होती । अपनी जिद को अपनी ताकत बनाइए और तब तक मत रुकिए, जब तक इतिहास आपके नाम से ना लिखा जाए ।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

