मूकनायक/ दुर्गेंद्र सम्राट ब्यूरो प्रभारी बस्ती/ उत्तर प्रदेश
बस्ती। नगर थाना क्षेत्र के दक्षिण टोला नगर में संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती के अवसर पर निकाली जा रही झांकी के दौरान हुई हिंसक घटना ने जिले की कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। श्रद्धा और भक्ति के माहौल में मंदिर से लौट रहे श्रद्धालुओं पर असामाजिक तत्वों द्वारा किए गए हमले से क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई। इस घटना में कई लोग घायल हुए, जिनमें महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल बताए जा रहे हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार झांकी में शामिल दलित समुदाय के लोगों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। आरोप है कि हमलावरों ने लाठी-डंडों और पत्थरों से हमला किया, जिससे मौके पर भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसके बावजूद नगर थाना पुलिस द्वारा अब तक न तो मुकदमा दर्ज किया गया है और न ही किसी आरोपी की गिरफ्तारी हुई है, जिससे पीड़ित पक्ष में भारी आक्रोश व्याप्त है।
सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के निर्देशों की अनदेखी
कानूनी जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस का पहला और अनिवार्य कर्तव्य FIR दर्ज करना है। पुलिस को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि मामला गंभीर है या नहीं सही है या गलत। FIR दर्ज करने के बाद जांच करना पुलिस की जिम्मेदारी है।
इसके बावजूद बस्ती की इस घटना में पुलिस द्वारा FIR दर्ज न करना न्यायालयों के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना माना जा रहा है। इससे न केवल पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो रही है, बल्कि कानून के प्रति आमजन का भरोसा भी कमजोर पड़ रहा है।
बीएनएस धारा 198 व लोक सेवा गारंटी अधिनियम के उल्लंघन का आरोप
पीड़ित पक्ष और सामाजिक संगठनों ने पुलिस की निष्क्रियता को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 198 का उल्लंघन बताया है। इस धारा के तहत किसी लोक सेवक द्वारा अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन न करना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
इसके साथ ही पुलिस पर उत्तर प्रदेश लोक सेवा गारंटी अधिनियम की धारा 4 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है, जिसमें नागरिकों को समयबद्ध सेवाएं और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
पीड़ितों का कहना है कि—
- संज्ञेय अपराध के बावजूद FIR दर्ज नहीं की जा रही है।
- दोषियों को संरक्षण दिए जाने का संदेह गहराता जा रहा है।
- दलित पीड़ितों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है।
खबरें चलने के बाद भी उच्च अधिकारी मौन
हैरानी की बात यह है कि घटना और पुलिस की भूमिका को लेकर जब मामला समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में व्यापक रूप से सामने आ चुका है, तब भी जिले के उच्च पुलिस अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। अब तक न तो किसी विभागीय जांच की घोषणा की गई है और न ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई है। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या प्रशासन इस मामले को दबाने का प्रयास कर रहा है।
जिलाधिकारी को शिकायत, न्याय की प्रतीक्षा
पीड़ित पक्ष ने पूरे मामले की लिखित शिकायत जिलाधिकारी को सौंपकर निष्पक्ष जांच, दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी और लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस कदम उठता नहीं दिख रहा है।
पीड़ितों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद FIR क्यों नहीं दर्ज की गई?
क्या बीएनएस धारा 198 और लोक सेवा गारंटी अधिनियम सिर्फ कागज़ों तक सीमित हैं?
खबरें चलने के बाद भी उच्च अधिकारी चुप क्यों हैं?
क्या दलितों के साथ हुई इस हिंसा पर किसी की जवाबदेही तय होगी?
अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक चुप्पी साधे रहता है और क्या इस मामले में दोषियों के साथ-साथ लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई होती है, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

