Thursday, February 26, 2026
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धम्मपद वाणी

यथा पुब्बुळकं पस्से, यथा पस्से मरीचिकं।
एवं लोकं अवेक्खन्तं, मच्चुराजा न पस्सति।।
अर्थ :- जो इस लोक बुलबुले के समान और मृग- मरीचिका के समान देखे, उस (ऐसे देखने वाले) की ओर मृत्युराज (आंख उठाकर) नहीं देखता।जो जीवन का महत्व समझ गया हो?
साधु , साधु , साधु
भवतु सब्बं मगलं
✍️ बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया (भारतीय बौद्ध महासभा) राजस्थान (दक्षिण)

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