मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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किताबें सिखाती हैं कि “इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है,” मगर समाज के लोग यह सिखाते हैं कि उस इंसानियत की कीमत कब और कहाँ चुकानी पड़ती है। लोगों के बदलते लहजे हमें ‘चेहरों के पीछे के चेहरे’ पढ़ना सिखा देते हैं और जो सबक एक मतलबी दोस्त या एक सख्त पड़ोसी दे सकता है, वह शायद ही किसी महान लेखक की पंक्तियों में मिले। किताबों से सीखा गया सबक परीक्षा के बाद धुंधला पड़ सकता है, लेकिन समाज की ठोकर से मिला सबक सीधा रूह में उतर जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में किताबों की अहमियत सर्वोपरि है। वे हमें इतिहास, विज्ञान, दर्शन और दुनिया भर की संस्कृतियों से परिचित कराती हैं। किताबों का ज्ञान हमें सही-गलत में फर्क करने में मदद करता है और तनाव कम करके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाता है, लेकिन सिर्फ किताबी ज्ञान एक शिक्षित व्यक्ति तो बना सकता है, परंतु एक परिपक्व इंसान बनाने के लिए जीवन के अनुभवों का होना अनिवार्य है। किताबों की अहमियत अपनी जगह है, परंतु सबक वही याद रहता है, जो वक्त और समाज के लोग सिखाते है, यह जीवन का एक बड़ा सच है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

