उत्तिट्टे नप्पमज्जेय्य, धम्मं सुचरितं चरे।
धम्म चारी सुखं सेति, अस्मिं लोके परम्हि च।।
अर्थ= उठें (उत्साही बने),प्रमाद न करें, दुराचरण से बचें। धर्मचारी इस लोक और परलोक (दोनों जगह) सुखपूर्वक विहार करता है।
*साधु ,साधु , साधु
✍️ *बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया (भारतीय बौद्ध महासभा) राजस्थान (दक्षिण)*

