लेखक : श्रवण कुमार अंतर्राष्ट्रीय मीडिया फैलो
सामाजिक महासम्मेलन किसी भी समाज के लिए केवल आयोजन नहीं होते। वे समाज की सामूहिक सोच, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा तय करते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने अपने सम्मेलनों को आत्ममंथन और सुधार का मंच बनाया, वही शिक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सम्मान की दिशा में आगे बढ़े।मेघवाल समाज का जिला स्तरीय महासम्मेलन, बालोतरा भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह अवसर केवल परंपराओं के दोहराव का नहीं, बल्कि यह सोचने का है कि समाज आज किन मुद्दों पर ठहर गया है और आगे बढ़ने के लिए किन निर्णयों की आवश्यकता है।देश के अन्य समाजों से मिले ठोस अनुभवपिछले वर्षों में भारत के कई समाजों ने सामाजिक कुरीतियों को खुले तौर पर स्वीकार कर उन पर निर्णय लिए हैं।महाराष्ट्र के अनेक दलित और पिछड़े वर्गों के सामाजिक संगठनों ने मृत्यु भोज जैसी परंपराओं को सामाजिक बाध्यता मानने से इंकार किया। शोक के समय दिखावे और खर्च के बजाय संवेदना और सहयोग को प्राथमिकता दी गई। कई स्थानों पर समाज स्तर पर शिक्षा सहायता कोष बनाए गए, जिनसे जरूरतमंद विद्यार्थियों की कॉलेज फीस और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मदद मिली।दक्षिण भारत के कुछ समुदायों ने सामूहिक विवाह सम्मेलन को सामाजिक नीति के रूप में अपनाया, जिससे अनावश्यक खर्च और कर्ज की प्रवृत्ति पर रोक लगी। समाज ने स्पष्ट किया कि सम्मान खर्च से नहीं, समझदारी से मिलता है।राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के कई समाजों ने बाल विवाह के विरुद्ध लिखित सामाजिक प्रस्ताव पारित किए। इसके परिणामस्वरूप स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में कमी और शिक्षा की निरंतरता बनी रही।उच्च शिक्षा : अवसर हैं, लेकिन पहुँच सीमितयह एक स्थापित तथ्य है कि देश के कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की सीटें पूरी तरह नहीं भर पातीं। विश्वविद्यालयों के प्रवेश आंकड़े यह बताते हैं कि समस्या अवसरों की नहीं, बल्कि जानकारी और मार्गदर्शन के अभाव की है।आज भी समाज के अनेक परिवार यह मान लेते हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालय केया बड़े संस्थान “हमारे लिए नहीं हैं।” यही मानसिक दूरी सबसे बड़ी बाधा है।बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम बताया था। संविधान ने अवसर दिए, लेकिन यदि समाज स्वयं आगे नहीं बढ़ेगा, तो ये अवसर कागज़ों तक ही सीमित रह जाएंगे।मृत्यु के बाद हरिद्वार जाना : आस्था नहीं, सामाजिक दबाव और पाखंडसमाज में यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है कि मृत्यु के बाद अस्थियां लेकर हरिद्वार जाना अनिवार्य मान लिया गया है। यह परंपरा अब आस्था से अधिक सामाजिक दिखावे और दबाव का रूप ले चुकी है।वास्तविकता यह है कि—हर परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैकई परिवार सामाजिक भय के कारण कर्ज लेकर हरिद्वार यात्रा करते हैंसमाज के पंच और आसपास का दबाव इसे “सम्मान” से जोड़ देता हैयह स्थिति चिंताजनक है। धार्मिक आस्था का उपयोग यदि सामाजिक दबाव बनाने के लिए किया जाए, तो वह पाखंड कहलाता है।संविधान और बाबा साहेब के विचार किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देते हैं कि वह अपने विवेक, सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार निर्णय ले।प्रगतिशील समाजों ने यह स्पष्ट किया है कि मृत्यु के बाद के कर्मकांड व्यक्ति का निजी विषय हैं, उन्हें सामाजिक बाध्यता बनाना न तो मानवीय है और न ही न्यायसंगत।सामाजिक दबाव का सीधा असर शिक्षा परहरिद्वार यात्रा, मृत्यु भोज और अन्य कर्मकांडों पर किया गया अनावश्यक खर्च सीधे बच्चों की शिक्षा पर असर डालता है।जो धन किताबों, कॉलेज फीस या प्रतियोगी परीक्षाओं में लग सकता था, वह सामाजिक दबाव की भेंट चढ़ जाता है।यह स्थिति समाज को आत्ममंथन के लिए बाध्य करती है।बाल विवाह : विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाबाल विवाह पर हुए सामाजिक अध्ययनों में यह बार-बार सामने आया है कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।जिन समाजों ने इस पर सख्त सामाजिक रुख अपनाया, वहां महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक भागीदारी में सुधार हुआ।यह विषय केवल कानून का नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का भी है।महासम्मेलन की भूमिका : अब निर्णय जरूरीआज आवश्यकता है कि सामाजिक महासम्मेलन—केवल स्वागत और सम्मान तक सीमित न रहेंउच्च शिक्षा और केंद्रीय संस्थानों तक पहुँच को एजेंडा बनाएंमृत्यु भोज और हरिद्वार यात्रा जैसे कर्मकांडों को स्वैच्छिक घोषित करेंसामाजिक दबाव को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करेंयही किसी समाज की परिपक्वता की पहचान होती है।निष्कर्षदेश और दुनिया के सामाजिक अनुभव स्पष्ट संदेश देते हैं—जो समाज आत्ममंथन करता है, वही आगे बढ़ता है।यदि मेघवाल समाज शिक्षा को प्राथमिकता दे,पाखंड और दबाव से दूरी बनाए,और बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों को व्यवहार में उतारे,तो समाज की दिशा और दशा दोनों बदली जा सकती हैं।

