मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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हम किसी फल को उसके पकने के मौसम से पहले ही पेड़़ से तोड़़ लें, तो वह ना केवल स्वाद में खट्टा होगा, बल्कि उसमें पोषक तत्व भी नहीं होंगे, जो पूर्णतः पकने पर मिलते हैं। वह फल ना तो खाने योग्य होता है और ना ही उसका कोई बाजार मूल्य रहता है। ठीक इसी प्रकार, जब हम किसी स्थिति को पूरी तरह समझे बिना या सही अवसर का इंतजार किए बिना प्रतिक्रिया देते हैं, तो हमारे प्रयास और शब्द अपना प्रभाव खो देते हैं । कभी-कभी सत्य बोलना भी तब व्यर्थ हो जाता है, जब सुनने वाला उसे ग्रहण करने की स्थिति में ना हो। सही बात अगर गलत समय पर कही जाए, तो वह सुधार के बजाय विवाद का भी कारण बन जाती है ।
जो व्यक्ति “मौन” और “प्रतीक्षा” की कला जानता है, उसके शब्द अंततः एक पके हुए फल की तरह मीठे और प्रभावशाली होते हैं । इसलिए प्रकृति हमें सिखाती है कि हर चीज का एक ‘सीजन’ होता है। संयम वह खाद है, जो हमारे व्यक्तित्व और वाणी को परिपक्व बनाती है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे शब्दों का मूल्य हो, तो हमें उन्हें सही समय की धूप में पकने देना चाहिए। बिना मौसम के फल और बिना समय के शब्द केवल पछतावा और व्यर्थता ही लाते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

