अर्थ=अत्तदत्थं परत्थेन, बहुनापि न हापये।
अत्तदत्थमभिञ्ञाय, सदत्थपसुनो सियो।।
परार्थ परार्थ के लिए आत्मार्थ को बहुत ज्यादा भी न छोड़ें! आत्मार्थ को जानकर सदर्थ में लगे रहें।
साधु , साधु , साधु
*✍️ *बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष दि बुद्धिष्ट सोसायटी आफ़ इंडिया राजस्थान (दक्षिण)*

