मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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समाज एक जीवंत इकाई है जो निरंतर परिवर्तनशील है। प्राचीन काल में बनाई गई कई प्रथाएं उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप सही हो सकती थीं, लेकिन आज के वैज्ञानिक और तार्किक युग में वे अपनी प्रासंगिकता खो चुकी हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत में अंधविश्वास, लैंगिक भेदभाव, सती प्रथा, असमानता, जातिगत भेदभाव या ‘छुआछूत’ जैसी कुरीतियाँ कभी परंपरा का हिस्सा थीं, लेकिन यदि हम इन्हें नहीं त्यागेंगे, तो वर्तमान में एक सभ्य समाज की कल्पना करना असंभव होगा क्योंकि जब परंपराएं अंधविश्वास, असमानता, जातिवाद या लिंगभेद का रूप ले लेती हैं, तो वे विकास की राह में बाधा बन जाती हैं।
परंपराएं मनुष्य के लिए बनी हैं, मनुष्य परंपराओं के लिए नहीं। विकास की दौड़ में हमें अपने अतीत का सम्मान अवश्य करना चाहिए, लेकिन उसे अपनी बेड़ी नहीं बनने देना चाहिए। एक समृद्ध और उन्नत समाज के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम पुरानी और बाधक बेड़ियों को तोड़कर मानवता के प्रकाश की ओर बढ़ें। प्रगतिशील समाज के लिए तर्कसंगत सोच और रूढ़ियों का त्याग आवश्यक है, जिससे एक समतामूलक, शिक्षित और समृद्ध समाज का निर्माण हो सके। जैसा कि कहा गया है कि “परिवर्तन ही संसार का नियम है” और यह परिवर्तन ही समाज के विकास का मूल मंत्र है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

