मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन भी एक यात्रा की तरह है। अक्सर देखा जाता है कि जब हम बस, ट्रेन या हवाई जहाज में सफर करते हैं तो हम बहुत अधिक सहनशील और ‘एडजस्ट’ (तालमेल बिठाने वाले) हो जाते हैं। यदि सीट थोड़ी तंग हो, सह-यात्री थोड़ा शोर कर रहा हो या सामान रखने में दिक्कत हो तो भी हम मुस्कुराकर या चुप रहकर काम चला लेते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वही इंसान जब अपने घर पहुँचता है तो छोटी-छोटी बातों पर अपना धैर्य खो देता है जो परिवार के प्रेम और एकता में बाधक और हानिकारक है।
परिवार वह नाव है, जो हमें जीवन रूपी सागर के पार ले जाती है। यदि नाव के भीतर ही कलह होगी, तो सफर मुश्किल हो जाएगा। जिस तरह हम सफर में ‘एडजस्ट’ करके मंजिल तक पहुँचने का आनंद लेते हैं, उसी तरह यदि हम परिवार में एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करना और नजरंदाज कर थोड़ा झुकना सीख लें, तो जीवन का हर दिन एक खूबसूरत सफर बन जाएगा। याद रखें, एडजस्टमेंट का मतलब समझौता नहीं, बल्कि अपनों के प्रति प्रेम और सम्मान है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

