
विशेष आलेख- अमिताभ दुफारे
उन्नीसवीं सदी में सामाजिक असमानता, अशिक्षा और लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध किए गए माता सावित्रीबाई फुले के संघर्षों का प्रभाव भारतीय संविधान के अनेक प्रावधानों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। शिक्षा, महिला अधिकार, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के क्षेत्र में उनके प्रयास आज संवैधानिक मूल्यों के रूप में स्थापित हैं।
माता सावित्रीबाई फुले का योगदान केवल बालिका शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने नारी अधिकार, जातिगत भेदभाव के उन्मूलन, विधवा पुनर्वास, बाल अधिकार, सामाजिक सुधार और मानवीय गरिमा के लिए निरंतर कार्य किया। उनके आंदोलनों ने समाज की जड़ हो चुकी रूढ़ियों को चुनौती दी और समानता आधारित व्यवस्था की नींव रखी।
संविधान और सावित्रीबाई फुले के विचार
बालिका एवं सार्वभौमिक शिक्षा-
संविधान का अनुच्छेद 21(A) 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। यह प्रावधान सावित्रीबाई फुले द्वारा प्रारंभ किए गए महिला शिक्षा आंदोलन की भावना से मेल खाता है।
बाल संरक्षण एवं महिला सुरक्षा-
1853 में स्थापित बाल हत्या प्रतिबंधक गृह और शिशु संगोपन गृह के माध्यम से विधवा और शोषण पीड़ित महिलाओं के बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था की गई। संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 शोषण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करते हैं, जो इन प्रयासों के अनुरूप हैं।
विधवा महिलाओं का उत्थान-
1852 में महिला सेवा मंडल की स्थापना कर विधवा महिलाओं के सामाजिक व आर्थिक सशक्तिकरण हेतु कार्य किया गया। संविधान का अनुच्छेद 15(3) महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद 51A (ई) स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं के त्याग पर बल देता है।
समानता और भेदभाव निषेध-
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है। वहीं अनुच्छेद 15 और 17 लिंग, जाति आधारित भेदभाव और अस्पृश्यता को समाप्त करने की संवैधानिक गारंटी देते हैं, जो जाति उन्मूलन के विचार से सीधे जुड़े हैं।
विधवा पुनर्विवाह और व्यक्तिगत स्वतंत्रता-
अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन और पुनर्वास की अवधारणा निहित है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक सुधार-
अनुच्छेद 51A (H) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और सुधार की भावना विकसित करने की बात करता है, जो सावित्रीबाई फुले के तर्कशील और प्रगतिशील विचारों के अनुरूप है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सावित्रीबाई फुले के आंदोलनों—जैसे महिला शिक्षा, दलित-बहुजन शिक्षा, सामाजिक सुधार और नारी समानता—का प्रभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 17, 21, 21(A), 38 और 46 में देखा जा सकता है।
सामाजिक चिंतकों के अनुसार, माता सावित्रीबाई फुले केवल समाज सुधारक नहीं थीं, बल्कि आधुनिक संवैधानिक चेतना की अग्रदूत थीं। उनके द्वारा बोए गए सामाजिक समानता और न्याय के बीज 1950 में संविधान के रूप में संस्थागत रूप ले सके। आज शिक्षा, समानता, महिला अधिकार और सामाजिक न्याय की चर्चा में उनके विचार स्वाभाविक रूप से समाहित दिखाई देते हैं।

