Thursday, February 26, 2026
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जब व्यक्ति सामाजिक रूढ़ियों और गलत परंपराओं को बिना तर्क के मानता है, तो वह वास्तव में होता है गुलाम

मूकनायक/देश
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समाज अक्सर ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से बंधा होता है। यह डर व्यक्ति को उसकी मौलिकता और सपनों की बलि देने पर मजबूर कर देता है। जब एक व्यक्ति सामाजिक रूढ़ियों और गलत परंपराओं को बिना तर्क के मानता है, तो वह वास्तव में एक गुलाम होता है। नशे की लत और तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता ने समाज के एक बड़े वर्ग को अपना ‘डिजिटल गुलाम’ बना लिया है। असली आजादी तभी संभव है, जब हम जागरूक बनें।
शिक्षा का असली उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन विकसित करना होना चाहिए। जब व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता रखता है और दूसरों की देखा-देखी करने के बजाय अपने मूल्यों पर चलता है, तभी वह गुलामी की इन अदृश्य जंजीरों को तोड़ पाता है। समाज को यदि प्रगति करनी है, तो हमें केवल शारीरिक गुलामी ही नहीं, बल्कि वैचारिक और तकनीकी गुलामी से भी लड़ना होगा। जैसा कि कहा गया है—”सच्ची स्वतंत्रता वह है जो हमें खुद का मालिक बनाए, दूसरों का पिछलग्गू नहीं।”
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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