स्वदेश कुमार
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हम दोनों के शीशे के घर, मैं भी सोचूं तू भी सोच।
फिर क्यूं अपने हाथ मेें पत्थर, मैं भी सोचूं तू भी सोच।।
जहां जुकरबर्ग मानव-जाति को ऑनलाइन संगठित करने का ख्वाब देख रहे है, वहीं ऑफलाइन दुनिया की ताजा घटनायें, सभ्यता के टकराव की परिकल्पना में नए सिरे से प्राण फूंकती लग रही है। बहुत से विद्वानों, राजनेताओं एवं दार्शनिकों का विश्वास है कि सीरियाई गृहयुद्ध, इस्लामिक स्टेट का उदय, ब्रेकिजट अशान्ति और यूरोपीय यूनियन की अस्थिरता आदि से पश्चिमी सभ्यता एवं इस्लामिक सभ्यता के बीच टकराव के परिणाम है। इस परिकल्पना के अनुसार मानव जाति हमेंशा से विभिन्न सभ्यताओं में विभाजित रहीं है। ये परस्पर विरोधी विश्वदृष्टियां, सभ्यताओं के बीच टकराव अपरिहार्य बना देती है। जिस प्रकार प्रकृति में विभिन्न प्रजातियां प्राकृतिक वरण के क्रूर नियमों के तहत अपने जीवित बने रहने का संघर्ष करती हैं, सिर्फ शक्तिशाली लोग ही वास्तविकता का बयान करने के लिये बचे रहते है। वे चाहें उदारवादी राजनेता हो या ख्यालों की दुनिया में रहने वाले मानव, वैज्ञानिक, दार्शनिक डाक्टर इत्यादि हों, वे समाज सुधार हेतु, जानबूझकर जोखिम उठाते है। मुसलमान मुल्क कभी भी पाश्चात्य मूल्यों को स्वीकार नहीं करते एवं पश्चिमी मुल्क कभी भी मुसलमानों को अपनाने में सफल नहीं हो सकते। उग्रवादी इस्लामपंथी जितने मोहम्मद साहेब से प्रभावित हैं, उतने ही मार्क्स एवं फूकों से। यूरोपीय सभ्यता वैसी कतई नहीं, जैसा यूरोपीय लोग उसको समझते है। ईसाईयत वैसी कतई नहीं, जैसा ईसाई उसको सोचते है, इस्लाम वैसा नहीं, जैसा मुस्लिम लोग उसको सोचते है, यहूदी मजहब वैसा नहीं है, जैसा यहूदी उसको समझते है। हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) वैसा बिल्कुल नहीं, जैसा आज हिन्दुत्ववादी उसको समझते है। मजहबियों ने सदियों से अपने-अपने धर्मों में आश्चर्यजनक ढंग से मिथ्या बातों को जोड़ा एवं परिभाषित किया, जिससे उनके पुरोहित वर्ग की श्रेष्ठता कायम रहे एवं बिना श्रम किये जीविका चलती रहे। सभी धर्म वाले जोर देते है कि हमारे मूल्य पूर्वजों की मूल्यवान धरोहर है, लेकिन जो एक मात्र चीज, हमें ऐसा कहने की गुंजाइश देती है, वह यह है कि हमारे वे पूर्वज बहुत पहले मर चुके होते हैं, वे खुद आकर गवाही नहीं दे सकते, इसलिये सबको उनकी बात पर विश्वास करना पड़ता है। विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बौद्ध धर्म है, जो आज से ढाई हजार वर्ष पहले भारत में उपजा था, वह आज भी वैसा ही है, जो पैदा होने के समय पर था।
जिसने कहा है कि जीवन में हजारों लड़ाईयां जीतने से बेहतर स्वयं पर विजय प्राप्त करना है, बुराई को बुराई से खत्म नहीं किया जा सकता, घृणा को केवल प्रेम द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है, भविष्य के बारे में मत सोचो, अतीत में मत उलझो, सिर्फ वर्तमान पर ध्यान दो।
हमें कोई अनुमान नहीं कि सन् 2050 में रोजगार मण्डी की क्या शक्ल होगी? आर्टीफिशियल इन्टेलीजेन्स का एक एप्लीकेशन है, जो कम्प्यूटरों की प्रकट तौर पर प्रोग्राम्ड हुए बिना, स्वचालित ढंग से सीखने एवं अनुभवों के आधार पर उन्नत होने में सक्षम बनाता है। रोबोटिक्स दही बनाने से लेकर योग सिखाने तक हर कार्यपद्धति को बदल देंगे। कुछ लोगों का मानना है कि एक या दो दशकों के भीतर अरबो लोग आर्थिक दृष्टि से बेकार हो जायेंगे, दूसरों लोगों के अनुसार आटोमेशन लम्बा समय बीत जाने के बाद भी नए रोजगार एवं सभी के लिये ज्यादा समृद्धि उत्पन्न करना जारी रखेगा। वर्तमान में हम किसी भयानक उथल-पुथल की कगार पर है। दक्षताएं सिर्फ मनुष्यों में सीखना, विश्लेषण करना, सम्प्रेषण करना एवं इन्सानी जज्बातों को समझना, लेकिन आर्टीफिशियल इन्टेलीजेन्स अब मनुष्यों को इन दक्षताओं के मामले में उत्तरोत्तर मात देने की शुरूआत कर रहा है जिसमें इन्सानी जज्बातों की समझ भी शामिल है, हमे शारीरिक, संज्ञानात्मक गतिविधियों से परे, गतिविधि के ऐसे किसी तीसरे क्षेत्र की जानकारी नहीं, जहां मानव हमेशा सुरक्षित बढ़त बनाये रख सकेंगे। इक्कीसवीं सदी मेें सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैवप्रौद्योगिकी मानव जाति के समक्ष जो चुनौतियां पेश कर रही है, वे तर्कसंगत ढंग से उन चुनौतियों के मुकाबले बहुत बड़ी है, जो पिछले युग के भाप के इन्जनों, रेलमार्गों एवं बिजली ने पेश की थी। हमारी सभ्यता की अपरिमित विनाशकारी शक्ति को देखते हुए हम अब और विफल तन्त्रों, विश्वयुद्धों एवं रक्तरंजित क्रान्तियों का जोखिम उठाने की हालत में नहीं है। इस बार वे बिफल तन्त्र परमाणु युद्धों जेनेटिक ढंग से गढ़ी गयी दैत्यलीलाओं जीवमंडल के सम्पूर्ण ध्वंस का कारण बन सकते है। परिवर्तन की गति में शिथिलता हमें रोजगारों के भरपाई के लिये नये रोजगार तैयार करने का समय उपलब्ध करा सकती है। आर्थिक उद्यमिता की शिक्षा और मनोविज्ञान में एक नयी क्रान्ति से जोड़ना आवश्यक होगा। ज्यादातर रोजगार महज आराम-तलब सरकारी नौकरियां नहीं होगी, ये रोजगार उच्चस्तरीय विशेषज्ञता की मांग करेंगे, एवं जैसे-जैसे ए0आई0 उन्नत होती जायेगी, इन्सानी कर्मचारियों को बार-बार नई दक्षताएं सीखनी होगी एवं रोजगार के व्यवसाय बदलने होंगे। सरकार को मूल भूत सुविधाएं जुटानी होगी। क्या लाखों लोग अपना मानसिक सन्तुलन खोए बिना खुद को बार-बार नई काबिलियतों के मुताबिक ढाल सकेगें? हमारे सारे प्रयत्नों के बावजूद अगर मानव जाति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रोजगार के बाहर ढकेल दिया गया, तो सन् 1789 की फ्रांस की राज्य क्रन्ति की पुर्नवृत्ति होगी। अगर मनुष्यों की न तो उत्पादकों के रूप में जरूरत है और न ही उपभोक्ताओं के रूप में, तो फिर उनके शारीरिक रूप से जीवित बने रह पाने की एवं उनकी मानसिक खुशहाली की हिफाजत किस चीज से होगी? अधिकतर रोजगार नीरस किस्म के काम होते है, जो बचाने लायक नहीं है। कैसियर होना किसी जीवन का सपना नहीं हो सकता। यूनीवर्सल बेसिक इन्कम किसी देश के सारे नागरिकों को, उनकी आय, संसाधनों या रोजगारपरक हैसियतों पर ध्यान दिये बगैर, एक निश्चित मात्रा में पैसे देने का मानक है, जिसका उद्देश्य गरीबी को रोकना या कम करना एवं बहुसंख्यक नागरिकों के बीच समानता में वृद्धि करना है। यू0बी0आई0 का उद्देश्य है कि सरकार एैल्गरिदमों और रोबोटो को नियमित कर रहे अरबपतियों एवं व्यापारिक संस्थानों पर टैक्स लगाए, एवं इन पैसों का इस्तेमाल हर व्यक्ति को समुचित मात्रा में वजीफा मुहैया कराने के लिये उपयोग करे, जो उस व्यक्ति की बुनियादी जरूरतों को पूरा सक सके। यह योजना गरीबों को रोजगारों की क्षति एवं आर्थिक विस्थापन से सम्बन्धित नुकसान को झेलने में सक्षम बनायेगी एवं अमीरों के कोप भाजन से बचायेगी। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो समाज का सन्तुलन बिगड़ जायेगा एवं स्थिति गृह युद्ध में बदल जायेगी। भूमन्डलीकरण ने एक मुल्क के लोगों को दूसरे मुल्कों के बाजारों पर पूरी तरह से निर्भर बना दिया है, लेकिन स्वचालन इस भूमन्डलीय व्यापारिक ताने-बाने को तार-तार करते हुए सबसे कमजोर सूत्रों के लिये विनाशकारी परिणाम पैदा कर सकता है। प्राकृतिक संसाधनों से वंचित विकासशील देशों ने अपने अनुकूल मजदूरों का सस्ता श्रम बेचकर आर्थिक प्रगति की है। आज भी लाखों की तादाद में बांग्लादेशी कमीजे तैयार करके, उनको संयुक्त राज्य अमेरिका के ग्राहकों को बेचकर आजीविका कमाते है, वही बंगलुरू के लोग काल सेन्टरों में अमेरिकी ग्राहकों की शिकायतों को निपटाते हुए अपनी रोजी-रोटी कमाते है।
विश्व की सबसे बड़ी ज्वलंत समस्याएं आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद एवं फांसीवाद उभर कर फैल रही है। आतंकवादी दिमाग पर नियंत्रण करने के मामले में उस्ताद होते है। वे बहुत थोड़े लोगों को मारते है, लेकिन तब भी करोड़ों लोगों को दहशत में भर देने और यूरोपीय यूनियन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विशालकाय राजनीतिक ढांचो को तहस-नहस करने देने में कामयाब हो जाते है। आतंकवादी चीनी मिट्टी के बर्तनों की किसी दुकान को नष्ट करने की कोशिश करती, मक्खी की तरह है। यह मक्खी इतनी कमजोर है कि वह चाय के कप तक को नहीं हिला सकती, इसलिये वह एक बैल को पकड़ती है, उसके कान के अन्दर घुस जाती है, एवं भनभनाना शुरू कर देती है, वह बैल खौफ एवं गुस्से से पागल हो जाता है और चीनी मिट्टी की उस दुकान को तहस-नहस कर देता है। मध्य पूर्व में पिछले दशक में इस्लामी कट्टरपन्थी इराक के सद्दाम हुसैन को दुनिया का कोई देश बाल-बांका भी नहीं कर सकता था, परन्तु इस्लामी कट्टरवाद से पोषित अल कायदा के ओसामा बिन लादेन ने 9/11 के हमले से संयुक्त राज्य अमेरिका को गुस्सा दिलाया, और अमेरिका ने इराक को तहस-नहस करके सद्दाम हुसैन को क्रूरता के साथ फंासी दे दी, एवं बिन लादेन को उसके घर जाकर मार गिराया। अकाल, महामारी, आतंकवाद एवं युद्ध आने वाले दशकों मेे लाखों लोगों को अपना शिकार बनाना जारी रखेगी। आतंकवाद एक सैन्य रणनीति, जो किसी तरह का माली नुकसान पहुंचाए बिना, दहशत फैलाकर, राजनीतिक स्थिति को बदलने की उम्मीद रखती है। जब सन् 1941 में जापान ने आकस्मिक हमला कर पर्लहार्बर, प्रशान्त महासागर में अमेरिका के नौसैनिक बेड़े को डुबा दिया था। इसका बदला अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में सन् 1945 में हीरोसिमा एवं नागासाकी में परमाणु बम गिराकर, जापान से लिया था। अगर आतंकवादी समूह सामूहिक नरंसहार के हथियारों को अपने कब्जे में ले लेते है, तो अनुमान लगाना मुश्किल है कि राजनीतिक संघर्षों को किस तरह अन्जाम दिया जायेगा, लेकिन वे 21वी शदी के आरम्भिक दौर की आतंकवादी एवं आतंकवाद विरोधी मुहिमों से भिन्न होंगे। अगर सन् 2050 में दुनिया परमाणु आतंकवादियों एवं जैव आतंकवादियो से भरी होगी। आतंकवाद धार्मिक कट्टरता का वाय-प्रोडक्ट है। धार्मिक कट्टरता बढ़ेगी, तो आतंकवाद बढ़ेगा। कम होगी तो आतंकवाद कम होगा।
भारत में दक्षिण पन्थी संघी सरकार की जन्म कुन्डली में साम्प्रदायिकता एंव आतंकवाद फैलाना मुख्य राजनीति रही है। 30 जनवरी सन् 1948 में, महात्मा गांधी पर चलने वाली तीन गोलियां संघी नाथूराम गोडसे के रिवाल्वर से निकली थी। 06 दिसम्बर सन् 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के तीन गुम्बद गिराने वाले गोडसे जैसे किसी असहिष्णु व्यक्ति ने नहीं, बल्कि विचार ने ढहाए थे। 06 दिसम्बर 1992 को अयोध्या मेें जिस उन्माद सिजोफेनिया एवं यूफोरिया के नतीजे में मस्जिद गिराने वाले साम्प्रदायिक, संघ परिवार के आतंकवादी संगठन थे। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबाना ने सन् 2015 में भारतीय दौरे के समय, हिन्दुत्व ब्रिगेड की तरफ परोक्ष संकेत करते हुए कहा था कि भारत तब तक सफल होता रहेगा, जब तक वह धार्मिक आस्था के आधार पर एक बटा हुआ देश नहीं है। अगर साम्प्रदायिक कट्टरवाद की समस्या से नहीं निपटा गया, जो देश को बांटने में लगा है तो मोदी द्वारा घोषित विकास योजनाएं जस की तस धरी रह जायेगी। किसी सार्वजनिक परियोजना का उद्घाटन हो या आधारशिला रखने का अवसर एक नारियल तोड़कर शुभ मुहूर्त की रस्म अदा करने की परम्परा लगभग सभी धर्मों के भारतीयों में प्रचलित है, जैसे पश्चिम में शैम्पेन की बोतल खोलकर किसी उत्सव की शुरूआत की जाती है। नोबेल पुरूस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा था कि हिन्दूवाद अयोध्या या गुजरात का हिन्दूत्व नहीं, यह सभी भारतीयों की एक धार्मिक, दार्शनिक आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहर है, जो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्रवाद को अर्थ प्रदान करती है। हिन्दूवाद कोई विशाल शिला स्तम्भ नहीं। इसकी शक्ति प्रत्येक हिन्दू में निहित है, न किसी एक विशेष वर्ग, समूह में। प्रजातंत्र का उपदेश देने वालों के हाथ खून से रंगे पाए गए, राष्ट्रपति निक्सन किसी भी दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपति की तुलना में ज्यादा मतों से जीते थे, फिर भी प्रेम और जनमानस के आगे झुकना पड़ा एवं सत्ता से बाहर जाना पड़ा। भारत में मठ, मन्दिर एवं आश्रम के भीतर सत्ता, शक्तिज्ञान के बीच पैदा होती है जिसमें होने वाले हास, परिहास, हिंसा व्यभिचार भ्रष्टाचार को सत्कर्म की श्रेणी में मान्यता दे दी जाती है। आज वे धर्म केन्द्र नहीं, सत्ता, सम्पत्ति एवं कम्पटीशन के केन्द्र बन गये। विश्व के देशों मेें इस्लाम और ईसाई धर्म वालों के बीच तकरार चल रही है, वही भारत मेें हिन्दुत्ववादी मुस्लिमों के प्रति नफरत एवं हिंसा को औजार बना रहे हैं। सन् 2014 से संघी सरकार आम आदमियों की रोटी कपड़ा, मकान स्वास्थ्य सम्बन्धी मौलिक जरूरते उपलब्ध कराने वाले उद्देश्यों को छोड़कर, बहुजन, अल्पसंख्यकों को यातनाएं देने भूखे मारने के षडयन्त्र रच रही है। कांग्रेस महासचिव झारखण्ड के बी0के0 हरिप्रसाद ने कहा कि गुजरात के साहेब (मोदी) की तुलना दुनिया के क्रूर तानाशाह ईदी अमीन से की जा सकती है। ईदी अमीन ने युगान्डा से साठ हजार भारतीयों को भगाया था, मोदी ने गुजराती लूटेरे पूंजीपतियों को अरबों बैंको का रूपया लेकर विदेशों में भगाने में मदद की। ईदी अमीन तानाशाह, आतंक एवं क्रूरता का दूसरा नाम माना जाता था उसने अपने देश के दस लाख बुद्धिजीवी, राजनीतिज्ञ समाज सुधारकों सैनिकों अपने विरोधियों का कत्ल करवाया था, वह स्वयं नरभक्षी था। गुजरात में गोधरा कान्ड से लेकर, अब तक सैकड़ों साम्प्रदायिक एवं आतंकी घटनाएं हुई उनके लिये जिम्मेदार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिन्दुत्ववादी संघटन रहे है एवं कोर्ट से निर्दोष साबित हुए।
मानववादी मजहब मनुष्यता का उपासक है, जो ईसाईयत, इस्लाम में यीशु मसीह एवं अल्लाह निभाया करते थे, जो भूमिका बौद्ध और ताओ धर्म में कुदरत के नियम निभाया था। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि कौन सा मजहब मानववाद की जगह ले सकता है। इसका उत्तर अभी भी किसी भी धर्म से नहीं मिला, केवल बौद्ध धर्म के अलावा। आज मानवता की सुरक्षा के लिये युद्ध नहीं, बुद्ध की जरूरत है। पिछली शदी के दौरान, जब वैज्ञानिकों ने होमो सेपियन्स का ब्लेक बाक्स खोला, तो वहां पर उनको न तो कोई आत्मा दिखाई दी, न स्वतंत्र निर्णय लेने वाली कोई शक्ति, उनको सिर्फ जीन्स, हार्मोन्स एवं न्यूट्रान दिखे, जो भौतिक एवं रासायनिक नियमों का पालन करते है। भगवान बुद्ध ने कहा कि आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते क्योंकि बदली बदली हुई आदतें ही आपका भविष्य बदलेगी। भारत में ऐसे बहुत सारे कानून आ रहे है जिसकी वजह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरा है। तानाशाह ईदी अमीन का जुमला है कि मैं आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारन्टी दे सकता हूँ लेकिन आपकी अभिव्यक्ति के बाद स्वतंत्रता की गारन्टी नहीं है। विश्व के सभी क्रूर तानाशाहों हिटलर, मुसोलिनी, ईदी अमीन आदि का अन्त इस तरह हुआ कि आप कल्पना नहीं कर सकते। सदियों से चली आ रही भारतीय समाज में व्याप्त असमानता, जातिवाद के चरम दौर में बाबा साहेब का अवतरण किसी ईश्वर से कमतर नहीं आंका जा सकता, जिन्होंने ढाई हजार वर्ष पुरानी बहुजनों की दासता की बेड़ियों को संविधान रचकर तोड़ दी। बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म एवं दर्शन को पुर्नजीवित किया, इससे पूर्व भारतीय उप महाद्वीप में बुद्ध धर्म लगभग बुझ चुका था। 12 मई 1956 के बाबा साहेब ने कहा था कि जब मैं बौद्ध धर्म को अपनाने की बात करता हूँ, तो मुझसे लोग दो सवाल पूछते हैं कि मैं बौद्ध धर्म क्यों पसन्द करता हूँ, दूसरा मौजूदा विश्व मेें यह धर्म किस तरह से प्रासांगिक है। हिन्दू धर्म के वर्णाश्रम धर्म एवं जाति व्यवस्था के अन्याय, असमानता से तंग आकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। हिन्दू धर्म में बुनियादी सुधार नहीं हो सकता। भगवान बुद्ध ने शील, समाधि, प्रज्ञा, करूणा मैमी की अवधारणा से मानव जाति को अमृत पथ पर ले जाने की दीक्षा दी। पूरे विश्व में वही एक महापुरूष हुए जिन्होंने अपनी पूजा करवाने के लिये मना किया था। उन्होंने कहा कि मैं चमत्कारी सन्त नहीं हूँ जो तुम्हारे दुखों को दूर कर दूंगा, तृष्णाओं के कारण अपने हिस्से का दुख तुम्हें ही दूर करना होगा। भगवान बुद्ध ने कहा है कि सृष्टि की तीन आधार भूत सच्चाईयां है कि हर चीज निरन्तर परिवर्तनशील है, किसी चीज में कोई टिकाऊ तत्व नहीं है, और कोई भी पूरी तरह से सन्तोषप्रद नहीं है। आप अपनी काया, अपने दिमाग की सुदूर आकाश गंगा तक छानबीन कर डाले, लेकिन आपको कभी कोई ऐसी चीज नहीं मिलेगी जो परिवर्तित न होती हो, जिसमें कोई सदैव सत्य हो, और जो आपको पूरी तरह से सन्तुष्ट कर सकती हो। दुख इसलिये उत्पन्न होता है, क्योंकि लोग इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते। उनका विश्वास होता है कि कही कोई शाश्वत सत्य है, अगर वे उसका पता लगा ले एवं सम्बन्ध जोड़ ले, तो वे पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जायेगे। इस शाश्वत सत्य को कभी ईश्वर के नाम से, पुकारा जाता है, कभी राष्ट्र के नाम से, कभी आत्मा के नाम से कभी प्रमाणिक स्वत्व, एवं कभी सच्चे प्रेम के नाम से पुकारा जाता है। लोग जितना ही इससे आसक्त होते जाते है, उतना ही उसको पाने में नाकामयाब होने की वजह से वे निराश एवं दयनीय होते जाते है। यह आसक्ति जितनी ही अधिक होती है, उतनी ही अधिक घृणा। बुद्ध के अनुसार जीवन में कोई अर्थ नहीं है और लोगों को कोई अर्थ पैदा करने की जरूरत नहीं है। उनको केवल इतना समझ लेना जरूरी है कि इस प्रकार आसक्तियों एवं अर्थशून्य घटनाओं के साथ हमारे जुड़ाव के पैदा होने वाले दुख से मुक्ति पा लेना जरूरी है। बुद्ध कहते है कि सबसे बड़ी समस्या है कि हम निरन्तर कुछ करते रहते है, जरूरी नहीं कि हम शारीरिक श्रम ही करते हों, हम घन्टो आँखे बन्द किये स्थित बैठे रह सकते है, तब भी मानसिक स्तर पर हम किस्से, पहचानें गढ़ने में, युद्ध लड़ने एवं जीत हासिल करने में अत्यन्त व्यस्त रहते है। सचमुच कुछ न करने का अर्थ है कि दिमाग भी कुछ न करे एवं कुछ न गढ़े। अगर आप आँखे मूंदकर बैठ जाते हैं, और अपनी नाक से आती-जाती सांसो की लक्ष्य करते रहते है, तब भी आप शायद उसके बारे में किस्से गढ़ना शुरू कर देते है। अगर मैं अपनी सिर्फ सांस को लक्ष्य करना जारी रखे एवं कुछ भी न करूं तो मुझे बोध की प्राप्ति हो जायेगी और मैं दुनिया का सबसे बड़ा प्रज्ञावान एवं सबसे बड़ा सुखी व्यक्ति बन जाऊंगा। इसके बाद यह महागाथा विस्तार लेना शुरू कर देती है, और लोग न केवल खुद की आसक्तियों से मुक्त करने, बल्कि दूसरों को भी वैसा ही करने को तैयार करने के अभियान पर निकल पड़ते है। विश्व शान्ति एवं सभ्यता को बनाए रखने के लिये बौद्ध धर्म की विपश्यना रामबाण है। अगर विश्य के आठ अरब मनुष्य नियमित रूप से ध्यान करने लग जायेंगे, तो सारी दुनिया में शान्ति एवं सार्वभौमिक समरसत्ता स्थापित हो जायेगी। आज मनुष्य के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक दुख से छुटकारा पाना है। इसके लिये आपको बौद्ध धर्म की शरण में जाना होगा। यज्ञ, कर्मकान्ड एवं पशुबलि की निन्दा करने वाला, विश्व का एक मात्र व्यवस्थित एवं संगठित बौद्ध धर्म है। जब धर्म का निर्धारण प्रकृति करती है तब वह सनातन हो जाता है। लेकिन जब इसका निर्धारण कोई व्यक्ति या एक विशेष वर्ग करता है तब वह एक वैचारिक विमर्श बन जाता है। बुद्ध ने कहा कि मनुष्य का प्राकृतिक चरित्र है, वह उसका सामाजिक चरित्र होना चाहिए, उसकी समाज के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए, व्यक्ति समाज का समुच्चय है। शास्ता ने मानव कल्याण हेतु पंचशील की स्थापना की थी कि पहली मैं अकारण प्राणी हिंसा से दूर रहने की शिक्षा, द्वितीय बिना दी गयी वस्तु को न लेने की शिक्षा, तीसरी में काम वासना से विरत रहने की शिक्षा चौथी मैं झूठ बोलने, चुगली करने से विरत रहने की शिक्षा पांचवी मैं कच्ची पक्की शराब, नशीली वस्तुओं के प्रयोग से विरत रहने की शिक्षा। दुनिया में हर हिंसक कृत्य की शुरूआत किसी के दिमांग में हिंसा की आकांक्षा के साथ होती है, जो किसी अन्य की शान्ति एवं सुख को भंग करने से पहले, स्वयं उस व्यक्ति की शान्ति एवं सुख भंग करती है। जब तक लोगों के मन में भरपूर लालच, ईष्या पैदा नहीं हो जाती, तब तक चोरी नहीं करता, हिंसा नहीं करता। देवानाम प्रिय, सम्राट अशोक ने कहा है कि व्यक्तिगत रूप से मुझे क्रूर विश्व विजेताओं का नहीं, बल्कि उन साधारण लोगों का वंशज होना पसन्द है, जो सभी धर्मों का समभाव एवं करूणा से प्रेम करते है। जो लोग दूसरे धर्मों के मामले में दखल नहीं देते।
मैत्रेय उपनिषद के एक श्लोक का भावार्थ है कि काल से सभी जीव उत्पन्न होते है, काल से ही विकसित और फलते-फूलते है काल से ही उनका अन्त होता है, काल देह में भी है और विदेह में भी।

