मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍️✍️
जौहरी बनने की प्रक्रिया आसान नहीं है। इसके लिए वर्षों का अनुभव, धैर्य और सूक्ष्म अवलोकन की आवश्यकता होती है। हीरा अपनी कठोरता और चमक के लिए जाना जाता है, लेकिन उसकी शुद्धता को मापने के लिए जौहरी को उसे कई पैमानों पर कसना पड़ता है। इसी तरह, किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की गहराई को समझने के लिए भी एक ऊँचे मानसिक स्तर और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, परंतु हीरा परखने वाले से दूसरों की पीड़ा परखने वाला ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ।
इसलिए हीरे की परख जौहरी ही जानता है, इसका का अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु या व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसकी बाहरी चमक से नहीं, बल्कि उसके गुणों से आँका जाना चाहिए। हमें स्वयं के भीतर ऐसे ‘जौहरी’ के गुण विकसित करने चाहिए जिससे हम समाज में छिपी हुई प्रतिभाओं और अच्छाइयों को पहचान सकें। जीवन में एक सच्चा पारखी वही है, जो मिट्टी में दबे सोने और पत्थर में छिपे हीरे को पहचानकर उसे दुनिया के सामने प्रकाशित कर सके।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

