मूकनायक/ डॉ नीरज कुमार/ शिमला संभाग प्रभारी: हिमाचल प्रदेश में दलित और वंचित समाज लंबे समय से कांग्रेस को अपने संरक्षक के रूप में देखता रहा है। वह राजनीतिक शक्ति जो सामाजिक न्याय की गारंटी देती आई है, संविधान के सकारात्मक भेदभाव की रक्षा करती है और गरीबों वंचितों के उत्थान का वादा करती है। लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही कांग्रेस की नीतियां अक्सर उस भरोसे को चोट पहुंचाती दिखती हैं। पहले भाजपा ने वंचितों के साथ खिलवाड़ किया, अब कांग्रेस उसी राह पर चल पड़ी है। नीतियां नहीं बदलीं, सिर्फ चेहरा बदल गया और कीमत चुका रहे हैं दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग। सबसे बड़ा सवाल तो एससी/एसटी सब-प्लान के धन के दुरुपयोग का है। यह राशि संवैधानिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जो दलित आदिवासी कल्याण के लिए आरक्षित है। मगर वर्षों से यह धन सामान्य मदों में खर्च होता रहा। लाभार्थी वंचित रह जाते हैं। यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित नीतिगत धोखा है। कांग्रेस सरकार ने अनुसूचित कल्याण बोर्ड को भी कमजोर कर दिया। जिसकी जिम्मेदारी निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन थी, उसे शक्तिहीन बनाना जवाबदेही से भागने का तरीका है। छात्रवृत्तियों में कटौती तो जैसे वंचित छात्रों के सपनों पर सीधा हमला है। घोषणाएं तो बड़ी बड़ी होती हैं, लेकिन नीयत में खोट साफ दिखती है। और अब ताजा प्रहार राज्य चयन आयोग द्वारा पटवारी (जॉब ट्रेनी) भर्ती में सभी अभ्यर्थियों से एकसमान 800 रुपये आवेदन शुल्क वसूलना। यह फैसला क्या है? कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर खुला हमला! एक तरफ पदों को ‘जॉब ट्रेनी’ का नाम देकर इसे अस्थायी और कम वेतन वाला बना दिया गया, ऊपर से एससी/एसटी जैसे सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से भी पूरी फीस वसूलना। जब ये समुदाय आज भी गरीबी और भेदभाव की जंजीरों में जकड़े हैं, तब समान शुल्क की यह नीति समानता नहीं, बल्कि गहरी असमानता को बढ़ावा देती है। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 की भावना सकारात्मक भेदभाव (affirmative action) को यह निर्णय कुंद कर रहा है। आरक्षित वर्गों के लिए फीस माफी या छूट तो दूर, उन्हें भी सामान्य वर्ग की तरह बोझ ढोने को मजबूर करना क्या संवैधानिक सामाजिक न्याय का अपमान नहीं? विश्लेषकों का यह भी मानना है कि हालही में स्वर्ण आयोग की मांग कर रहे कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा फीस को एक सामान करने की मांग सरकार के समक्ष उठाई गई थी और सरकार ने आंदोलन के दबाव के कारण यह फैसला लिया है। कांग्रेस हमेशा सामाजिक न्याय की दुहाई देती है, लेकिन उसके फैसले नवउदारवादी सोच से लबालब दिखते हैं। जहां कल्याण को ‘बोझ’ माना जाता है और वंचितों की सुविधा को अनावश्यक खर्च। पटवारी भर्ती में यह एकसमान फीस नीति दलित आदिवासी युवाओं के लिए सरकारी नौकरी के दरवाजे पर एक और ताला है। क्या यही है कांग्रेस की ‘माँ’ वाली छवि? भाषणों में डॉ. अंबेडकर को याद करना आसान है, लेकिन नीतियों में उनके संवैधानिक सपने को कुचलना घोर पाखंड है। समय आ गया है कि सरकार जवाबदेही दिखाए। एससी/एसटी सब-प्लान का धन उसके असली उद्देश्य पर खर्च हो, कल्याण बोर्ड को पूर्ण अधिकार मिलें, छात्रवृत्तियां बहाल हों और सबसे जरूरी पटवारी भर्ती सहित सभी भर्तियों में वंचित वर्गों के लिए फीस छूट तत्काल लागू हो। अन्यथा, वंचित समाज की आंखें खुल जाएंगी और कांग्रेस की कथनी करनी की खाई इतनी चौड़ी हो जाएगी कि उसे पार करना असंभव हो जाएगा। यह सिर्फ 800 रुपये फीस का मामला नहीं यह संविधान की आत्मा, वंचितों के विश्वास और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है। अगर कांग्रेस सरकार अब भी नहीं जागी, तो इतिहास गवाह रहेगा कि सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता हासिल करने वाली पार्टी ने खुद उसकी जड़ें खोखली कर दीं।

