मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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सही या ग़लत, अपनी अपनी सुविधा के दो नाम हैं! जो जैसा दिखता है, वो वैसा होता नहीं है और जो जैसा है, वह वैसा दिखता नहीं है। कभी उसके व्यक्तित्व के कारण और कभी हमारे दृष्टिकोण के कारण। वैसे भी दुनिया बहुत बदल गई हैं । यदि आप किसी से नाराज़ होंगे तो लोग आपको छोड़ना पसंद करेंगे, मनाना नहीं, क्योंकि निंदा ही इस संसार का नियम है, जो आपको भरपूर मिलेगी । प्रशंसा तो ज्यादातर लोग मजबूरी और स्वार्थ में करते है ! संतुलित दृष्टिकोण यह है कि दोनों को समान रूप से स्वीकार किया जाए। बिना किसी कारण की निंदा से बचना चाहिए और सच्ची प्रशंसा को दिल से स्वीकार करना चाहिए।
एक परिपक्व समाज वही है जहाँ आलोचना रचनात्मक हो और सराहना वास्तविक हो, ताकि सभी के विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके। जीवन में निंदा और प्रशंसा दोनों का महत्व है क्योंकि दोनों ही हमें अपनी कमियों को जानने और अपनी खूबियों को पहचानने का मौका देते हैं। देखा जाए तो ज्यादा कुछ नहीं बदला जिंदगी में, बस बटुए थोड़े भारी और रिश्ते थोड़े हल्के हो गए। बाकी:- यूं तो भावनाओं के पांव नहीं होते, फिर भी दिल तक पहुंच ही जाते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

