मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर यह आम देखने सुनने को मिल रहा है कि किसान, मजदूर या कोई भी सामान्य आदमी सौफा, एसी, फ्रीज, टीवी व व्हीकल आदि की मामूली सुविधाओं के चक्कर में दूसरों की तुलना करके बाहरी दिखावे के प्रदर्शन में अपनी हैसियत व सक्षमता से अधिक कर्जा लेकर कर्ज के जाल में फंस जाते हैं । होश तब आता है, जब आय का कोई साधन ना होने पर लिए गए कर्ज की मासिक किस्त या क़र्ज़ चुकाने पर तनाव की जिंदगी जीने के लिए इंसान विवश हो जाता है।
सच यह है कि कुछ निजी व अहम जरुरतों के अतिरिक्त कुछ अन्य ऐसी चीजें हैं, जिनके वगैर रहा नहीं जाता, लेकिन समाज में हैसियत की बात, उसका दिखावा व दूसरों से तुलना का मामला कभी खत्म नहीं होता । ऐसे में अगर कोई दिखावा में विश्वास रखता है तो किस्त दर किस्त भरने के लिए अपनी मेहनत की कमाई को यों ही खर्च करने में गुम होना पड़ता है । अन्यथा सादा जीवन, उच्च विचार का रास्ता हमेशा खुला है। कहा भी गया है कि जिसकी जरूरतें कम हैं, उसके हाथ में दम है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

