मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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कई बार दूसरों से तुलना करना अपने आपमें ईर्ष्या, जलन और द्वेष जैसी भावना पैदा कर देती है। आप खुद को लेकर हमेशा असंतुष्ट और कुढ़ते रहते हैं। मन कभी भी खुश या सकारात्मक नहीं रहता है। दूसरों की उपलब्द्धि पर उसे प्रोत्साहित करने की भावना भी खत्म हो जाती है । दूसरों से लगातार तुलना करने पर श्रेष्ठता और हीनता की भावनाएँ खत्म नहीं होती हैं, बल्कि ये एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं और खत्म होने के बजाय और मज़बूत हो सकती हैं। जब आप दूसरों से अपनी तुलना करते हैं, तो आप एक दुष्चक्र में फंस जाते हैं, जहाँ आप या तो खुद को दूसरों से बेहतर महसूस करते हैं या कमजोरी महसूस करते हैं।
इस तुलनात्मक सोच को खत्म करने के लिए, अपनी स्वयं की उपलब्धियों और गुणों पर ध्यान देना और अपनी प्रगति और सफलता से संतुष्ट रहना महत्वपूर्ण है। तुलना वो ज़हर है जो धीरे-धीरे आपके आत्मविश्वास को खा जाता है, लेकिन वही तुलना अगर सही तरीके से की जाए, तो वो अमृत बन सकती है। इसलिए दिखावे से तुलना मत करो, दृष्टिकोण और अनुभव के आईने से तुलना करो। कभी खुद को कम मत समझो क्योंकि वो जो दिख रहा है, वह पूरा सच नहीं है। हर एक व्यक्ति का जीवन एक किताब है और हर किताब की एक अलग कहानी होती है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

